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रविवार, 22 नवंबर 2020

Citizenship

 

नागरिकता(Citizenship)

किसी भी राज्य की जनसंख्या को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है- पहला नागरिक, दूसरा अन्य देशी। नागरिक को सिविल अधिकार प्राप्त है, परन्तु विदेशियों को यह अधिकार नही मिलते है। संविधान में नागरिकता की कोई परिभाषा नही दी गई है। भारत में ब्रिटेन के समान एकल नागरिकता की कोई परिभाषा नही दी गई है, जबकि अमेरिका में दोहरी नागरिकता।

नोट- हमारा संविधान परिसंघीय है, फिर भी इसमें केवल एक ही नागरिकता की व्यवस्था है अर्थात भारत की नागरिकता। जबकि अमेरिका परिसंघीय राज्य है और वहाँ दोहरी नागरिकता है अर्थात परिसंघ की या राष्ट्रीय नागरिकता और उस राज्य की नागरिकता जहाँ उस व्यक्ति का जन्म हुआ है, जहाँ वह स्थायी रुप से निवास करता है।

संविधान नागरिकता से सम्बन्धित पूरी विधि नही प्रस्तुत करता है। संविधान का भाग-2 केवल उन वर्गों के लोगों के बारे में उल्लेख करता है, जो संविधान के लागू होने का समय अर्थात 26 जनवरी 1950 को भारतीय नागरिक माने गये थे और नागरिकता से सम्बन्धित शेष बातों के लिए विधि बनाने की शक्ति संसद को प्रदान करता है तथा अनुच्छेद-2 संसद को इस विषय पर विधि बनाने की शक्ति प्रदान करता है, जिसके तहत् संसद द्वारा भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 में यह भी अभिकथित है, कि- संविधान के उपबन्धों के अधीन किस प्रकार किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता समाप्त हो जाये, चाहे वह नागरिकता अधिनियम 1955 के अधीन अर्जित की गई हो या उसके पूर्व ( अनुच्छेद-(5-8) ) के अधीन। यह तीन प्रकार की हो सकती है-

 1. त्यागने पर (स्वेच्छा से छोड़ने पर)

 2. पर्यवासन पर ( स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता लेने पर)

 3. वंचित किये जाने पर ( जबरदस्ती निकाल दिये जाने पर)

संविधान के प्रारम्भ पर नागरिकता- संविधान के निम्न व्यक्ति भारत के नागरिक होंगे-

·        अधिवास द्वारा।

·        पाकिस्तान से प्रवर्जन करके आये हुए व्यक्तियों की नागरिकता।

·        भारत से पाकिस्तान प्रवर्जन करने वाले व्यक्तियों की नागरिकता।

·        विदेशों में रहने वाले व्यक्तियों की नागरिकता।

अनुच्छेद-9:वह व्यक्ति भारत का नागरिक नही होगा या भारत का नागरिक नही माना जायेगा, जो स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता स्वीकार कर लेगा।

अनुच्छेद-10: संसद द्वारा नागरिकता के अधिकारों का विनियमन।

अनुच्छेद-10 यह उपबन्धित करता है, कि व्यक्ति पूर्ववर्ती उपबन्धों के अनुसार भारत का नागरिक है या समझा जाता है। वह भारत का नागरिक बना रहेगा, किन्तु उसका यह अधिकार संसद द्वारा बनायी गई विधि के अधीन होगा। नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार भारतीय नागरिकता पाँच प्रकार से प्राप्त की जा सकती है-

1. जन्म से- प्रत्येक व्यक्ति, जिसका जन्म संविधान लागू होने अर्थात 26 जनवरी 1950 को या उसके बाद भारत में हुआ हो, वह जन्म से भारत का नागरिक होगा, यदि कोई व्यक्ति भारत के राज्य क्षेत्र में अधिवासी है और जो भारत के राज्य क्षेत्र में जन्मा है, चाहे उसके माता-पिता की राष्ट्रीयता कुछ भी हो, वह भारत का नागरिक होगा।

2. वंशक्रम द्वारा नागरिकता- कोई ऐसा व्यक्ति, जो 26 जनवरी 1950 को या उसके बाद भारत के बाहर पैदा हुआ हो। वंशक्रम के अनुसार भारत का नागरिक होगा, यदि उसके जन्म के समय उसके माता या पिता में से कोई भी भारत का नागरिक हो।

नोट:- माता की नागरिकता के आधार पर विदेश में जन्में व्यक्ति को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान नागरिकता संशोधन अधिनियम 1922 में किया गया

3. पंजीकरण द्वारा नागरिकता- निम्न व्यक्तियों में से कोई व्यक्ति पंजीकरण द्वारा भारतीय नागरिकता ग्रहण कर सकता है-

·        ऐसा व्यक्ति, जिसका जन्म भारत में हुआ हो, किन्तु भारत से बाहर किसी अन्य देश में निवास कर रहा हो।

·        ऐसी विदेशी महिला, जो किसी भारतीय से विवाह कर चुकी हो या करने वाली हो।

·        भारतीय नागरिकों के अवयस्क बच्चें।

·        राष्ट्रमण्डल देशों के ऐसे नागरिक, जो भारत में रहते हो या भारत सरकार की नौकरी करते हो।

4. देशीकरण से- कोई विदेशी, जो वयस्क है और 10 वर्ष से भारत में निवास कर रहा हो। भारत सरकार से देशीकरण के प्रमाण पत्र प्राप्त कर भरत का नागरिक बन सकता है।

5. भूमि अर्जन द्वारा- यदि भारत सरकार द्वारा किसी नये भू-भाग को अर्जित कर भारत में इसका विलय किया जाता है अर्थात यदि कोई अन्य राज्य क्षेत्र भारत का भू-भाग बन जाता है, तो भारत सरकार यह विनिर्दिष्ट करेगी की उस राज्य क्षेत्र के व्यक्ति भारत के नागरिक होंगे।

बुधवार, 11 नवंबर 2020

Preamble

 

     उद्देशिका या प्रस्तावना (PREAMBLE)

श्री सुब्बाराव के शब्दों में- उद्देशिका किसी एक्ट के मुख्य आदर्शों एवं आकांक्षाओं का उल्लेख करती है।

सुप्रीम कोर्ट के शब्दों में- सुप्रीम कोर्ट के अनुसार उद्देशिका संविधान निर्माताओं के विचारों को जानने की कुंजी है।

बेरुबारी मामले में(1960)-  बेरुबारी के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि उद्देशिका संविधान का अंग नही है।

केशनवानन्द भारती बनाम केरलराज्य (1973)- केशवानन्द भारती के मामले में उच्चतम न्यायालय ने बेरुबारी को दिये निर्णय को उलटते हुए, यह निर्धारित किया की उद्देशिका संविधान का एक अंग(भाग) है।

 

1. संविधान के अधिकार का स्त्रोत- हम भारत के लोग ........इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते है। अर्थात ये शब्द लोगों के सर्वोच्च प्रभुता की घोषणा करते है और इस बात की ओर संकेत करते है, कि संविधान का आधार उन लोगों का प्राधिकार है।

2. भारत की प्रकृति- यह घोषणा करती है, कि भारत एक सम्प्रभु, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य व्यवस्था वाला देश है।

3. संविधान का उद्देश्य- न्याय, स्वतन्त्रता, समता एवं बन्धुत्व।

4. संविधान लागू होने की तिथि- 26 नवम्बर 1949, मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत 2006 विक्रमी।

5. संविधान का स्त्रोत- भारत के लोग ही संविधान के स्त्रोत है।

6. प्रस्तावना के मुख्य शब्द- प्रस्तावना में कुछ मुख्य शब्दों का उल्लेख है, जो निम्नलिखित है-

·        प्रभुतासम्पन्न (Sovereignty)- इस शब्द का आशय है, कि भारत आन्तरिक व बाह्य दृष्टि से किसी भी विदेशी सत्ता के अधीन नही है अर्थात इसके ऊपर और कोई शक्ति नही है।

·        लोकतान्त्रिक (Democratic)-लोकतान्त्रिक सरकार जनता के लिए तथा जनता के द्वारा स्थापित सरकार है। इसमें जनता द्वारा निर्वाचत प्रतिनिधि देश का शासन चलाते है।

·        पंथ निरपेक्ष (Secular)- यह शब्द 42वे संविधान संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा गया है। पंथ निरपेक्ष की धारणा संविधान में प्रयुक्त विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता कि पदावली में पहले से अन्तर नही थी। पंथ निरपेक्ष राज्य का तात्पर्य ऐसे राज्य से है, जो किसी विशेष धर्म को राजधर्म के रुप में मान्यता प्रदान नही करता है, वरन् सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करता है, तथा उन्हें समान संरक्षण प्रदान करता है।

·        समाजवाद (Socialism)- यह शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के तहत् जोड़ा गया। उद्देशिका में प्रयुक्त आर्थिक न्याय पदावली में समाजवाद की अवधारणा अन्तर्निहीत है। इसकी कोई निश्चित परिभाषा देना कठिन है। भारतीय समाजवाद लोकतान्त्रिक समाजवाद है, न कि साम्यवादी समाजवाद जिसे राज्यश्रित समाजवाद भी कहा जाता है। जिसमें उत्पादन और वितरण के सभी साधनों का राष्ट्रीयकरण और निरीह सम्पत्ति या साधनों का उन्मूलन शामिल है। लोकतान्त्रिक समाजवाद मिश्रित अर्थव्यवस्था में आस्था रखता है, जहाँ सार्वजनिक और निजी क्षेत्र साथ-साथ रहते है। अतएव भारत का संविधान प्राइवेट सम्पत्ति का उन्मूलन नही करता, किन्तु उस पर कुछ निर्बन्धन लगाता है, जिससे उसका उपयोग राष्ट्रीय हित में किया जा सके।

·        अखण्डता (Integrity)- ये शब्द भी 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया है। इस शब्द का समावेश पृथकतावादी प्रवृत्तियों को रोकने के लिए किया गया है।

·        गणतन्त्र (Republican)- इस शब्द से स्पष्ट है, कि भारत में वंशानुगत राजा की परम्परा का अंत हो गया है अर्थात भारत का राज्यध्यक्ष जनता का अप्रत्यक्ष चुना हुआ प्रतिनिधि होता है।

·        संविधान का उद्देश्य (Purpose of Constitution)- संविधान का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को निम्न अधिकार दिलाना है। न्याय(सामाजिक, राजानीतिक और आर्थिक), स्वतन्त्रता, विचार, मत, विश्वास, उपासना।

·        समता (Equality)- व्यक्ति की गरिमा और राज्य की स्वतन्त्रता।

7. उद्देशिका में संविधान (Constitution of Preamble)- केशवानन्द भारतीय बनाम केरल राज्य (1973) के मामले में सरकार की ओर से तन्त्र दिया कि उद्देशिका भी संविधान का एक भाग है, इसलिए अनुच्छेद-368 के तहत् इसमें संशोधन किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से यह निर्धारित किया कि, उद्देशिका संविधान का भाग है, अतः यह संशोधनीय है, किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उद्देशिका के उस भाग को संशोधित नही किया जा सकता है, जो आधारभूत ढ़ाँचे से सम्बन्धित हो।

8. प्रस्तावना में संशोधन की सम्भावना (Possibility of amendment in the preamble )- क्या प्रस्तावना में संविधान के अनुच्छेद-368 के तहत् संशोधन किया जा सकता है। यह प्रश्न पहली बार ऐतिहासिक केस केशवानन्द भारती(1973) के मामले में उठा। यह विचार सामने आया कि इसमें संशोधन नही किया जा सकता, क्योंकि यह संविधान का भाग नही है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि अनुच्छेद-368 के जरिए संविधान के मूल तत्व व मूल विशेषताओं, जो कि प्रस्तावना में उल्लिखित है, को ध्वस्त करने वाला संशोधन नही किया जा सकता है।

9.  उद्देशिका का महत्व (Importance of Preamble)-

·        सुभाष कश्यप- “संविधान शरीर है, तो प्रस्तावना उसकी आत्मा, प्रस्तावना आधारशिला है, तो संविधान उस पर खड़ी अट्टालिका।“

·        कृष्णा स्वामी अय्यर- “संविधान की उद्देशिका हमारी दीर्घकालिक सपनों का विचार है।“

·        के.एम. मुंशी- “हमारी सम्प्रभु लोकतान्त्रिक गणराज्य का भविष्यफल है।“

·        अर्नेस्ट बेकर- “उद्देशिका संविधान की कुंजी है।“ इन्होंने अपनी पुस्तक “Principle of Social and political theory” के प्रारम्भ में उल्लेख किया है।

·        पालकी वाला- “उद्देशिका संविधान का परिचय पत्र है।“

10. परिसंघ कल्प- संघ की सरकार, की शक्ति पर इतना बल दिया गया है, कि उससे उन सिद्धान्तों पर प्रभाव पड़ता है। जो सामान्तया परिसंघ के आधार समझे जाते है। इसके कारण एक विदेशी आलोचक प्रो. वेयर ने कहा है, कि-  भारत का संविधान एक ऐसी शासन प्रणाली की व्यवस्था करता है, जो कि परिसंघकल्प है। वह ऐकिक राज्य जिसमें कुछ अनुसंघीय परिसंघीय लक्षण है, यह अनुसंघीय ऐकिक लक्षण परिसंघीय राज्य नही है।

‘भारत का संविधान न तो शुद्ध रुप से परिसंघीय है और न तो शुद्ध रुप से ऐकिक, यह दोनों का समायोजन है। यह एक नये प्रकार का संघ या सम्मिलित राज्य है। इसमें यह सिद्धान्त अन्तर्विष्ट है, कि परिसंघ होते हुए भी राष्ट्रीय हित सर्वोच्च होना चाहिए।‘

11. संविधान के विशिष्ट लक्षण- संविधान के इतने विशान होने के अनेक निम्नलिखित कारण है।

·        विभिन्न संविधानों के संचित अनुभवों का समावेश।

·        विस्तृत प्रशासनिक उपबन्ध भी शामिल किये गये है- भारतीय संविधान के रचयिता शासन के मूल सिद्धान्तों को अधिनियमित करने से ही सन्तुष्ट नही हुए, उन्होंने प्रशासनिक बातों के ब्योरे का उपबन्ध करने के लिए भारत शासन अधिनियम 1935 को अंशतः अपना लिया।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर के शब्दों में- “प्रशासन के रुप में परिवर्तन किये बिना संविधान का दुरुपयोग करना बिल्कुल सम्भव है।“

·        इकाईयों का संविधान भी सम्मिलित है- भारत में संविधान के संघ और इकाई दोनों के संविधान सम्मिलित है। परिसंघ की इकाईयों का ऐतिहासिक उद्भव और राजनीतिक विकास अलग-थलग था,इसलिए विभिन्न वर्ग की इकाई के लिए विभिन्न उपबन्ध बनाये गये।

·        परिसंघीय संबन्धों पर विस्तार से विचार- इकाईयों से सम्बन्धित उपबंध तो विस्तार से बनाये ही गये है, साथ ही परिसंघ और इकाईयों के बीच और इकाईयों में परस्पर सम्बन्ध के उपबन्ध भी विस्तार से बनाये गये है। ये सम्बन्ध विधायी या प्रशासनिक दोनों ही है।

·        प्रवर्तनीय और अप्रवर्तनीय दोनों प्रकार के अधिकार सम्मिलित किये गये हो- अमेरीकी संविधान के संशोधनों के नमूने पर एक अधिकार विलेख है, जिसमें व्यक्ति को न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय मूल अधिकार प्राप्त है, इसके अतिरिक्त नीति निदेशक तत्वों को समाविष्ट करने वाला एक भाग भी है, जो व्यक्ति को न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय अधिकार प्रदान नही करता, किन्तु उन्हें देश के शासन में मूलभूत समझा जाता है।

·        लचीला अधिक कठोर कम- भारतीय संविधान का एक विशेष लक्षण यह भी है, कि वह लिखित परिसंघ संविधान को लचिलापन प्रदान करता है। संविधान के गिने-चुने उपबन्धों के संशोधन के लिए ही राज्य विधानमण्डलों से अनुसमर्थन की अपेक्षा है और तब भी आधे विधानमण्डलों का समर्थन ही पर्याप्त है, शेष संविधान का संशोधन संघी की संसद के विशेष बहुमत से किया जा सकता है अर्थात प्रत्येक सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत से और यह बहुमत सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत भी होना चाहिए। संसद को संविधान के बहुमत से उपबन्धों में साधारण बहुमत से परिवर्तन या उपान्तर करने की शक्ति दी गई है। साधारण विधेयक के लिए भी इतनी ही अपेक्षा होती है। लचीलेपन का उदाहरण संविधान में संसद को विधान बनाकर संविधान की अनुपूर्ति करने के लिए दी गई शक्तियाँ।

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

भारतीय संविधान का निर्माण

संविधान का निर्माण

भारत में संविधान सभा के गठन का विचार वर्ष ‘1934’ में पहली बार ‘एम. एन. राय’ ने रखा। 1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पहली बार भारत के संविधान के लिए अधिकारिक रुप से संविधान सभा के गठन की माँग की।

1938ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से पण्डित जवाहर लाल नेहरु ने घोषणा की, कि स्वतन्त्र भारत के संविधान का निर्माण व्यस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गयी संविधान सभा द्वारा किया जायेगा, जिसमें किसी का हस्तक्षेप नही होगा। नेहरुजी की इस माँग को ब्रिटिश सरकार ने सैद्धान्तिक रुप से स्वीकार किया और इसे अगस्त प्रस्ताव ‘1940’ के नाम से जाना जाता है।

क्रिप्स मिशन (1942)- जब ब्रिटिश सरकार को यह पूर्ण विश्वास हो गया, कि भारतीयों के मांगों की अधिक दिन तक उपेक्षा नही की जा सकती है। फलतः(इसके कारण) तत्कालीन प्रधानमन्त्री ‘चर्चिल’ ने स्टेफर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक दूत मण्डल भारत भेजा। जिसमें कुल तीन सदस्य थे। जिसमें पैथिक लॉरेन्स, ए.वी. अलेक्जेण्डर एवं स्टेफर्ड क्रिप्स सम्मिलित थे। जो क्रिप्स मिशन के नाम से जाना गया। क्रिप्स के प्रस्तावों के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने भारत के बारे में निम्नलिखित सुधारों की घोषणा की-

v द्वितीय विश्व युद्ध ‘1944’ की समाप्ति के पश्चात् एक निर्वाचित संविधान सभा की स्थापना की जायेगी।

v संविधान सभा में भारतीय राज्यों के प्रतिनिधि भी शामिल किये जायेंगे।

v ब्रिटिश सरकार इस प्रकार बनाए गए संविधान को निम्नलिखित शर्तों के साथ स्वीकार करेगी-

·        ब्रिटिश भारतीय प्रान्तों को यह अधिकार होगा कि वे चाहे तो इस संविधान को स्वीकार कर संघ में शामिल हो जाय या अपने लिए नये संविधान की रचना करें।

·        ब्रिटिश सरकार उनके संघ में शामिल होने के लिए कोई सिफारिश या दबाव नही डालेगी। ऐसे प्रान्तों द्वारा नए संविधान के निर्माण कर लेने पर ब्रिटिश सरकार उन्हें भारतीय संघ के समान ही स्थिति प्रदान करेगी।

·        संविधान सभा व ब्रिटिश सरकार के बीच एक सन्धि पत्र पर हस्ताक्षर किये जायेंगें, जिसमें ब्रटिश के हाथों से भारतीय शासन के हस्तान्तरण से उत्पन्न समस्याओं के हल की व्यवस्था होगी। सन्धि पत्र में सरकार द्वारा दिए गए वचनों के अनुसार जाति एवं भाषा सम्बन्धी अल्पसंख्यक वर्गों की सुरक्षा का भी प्रावधान था।

क्रिप्स मिशन ने संविधान निर्मात्री सभा के आकार को निश्चित कर दिया था। युद्ध समाप्ति के पश्चात् प्रान्तीय विधानसभाओं का चुनाव किया जाना था। जो संविधान निर्मात्री सभा के सदस्यों का चुनाव करती।

संविधान सभा के सदस्यों की संख्या प्रान्तीय विधानसभाओं की संख्या का 1/10 भाग से अधिक नही हो सकती।

प्रत्येक प्रान्त को अपनी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधि चुनने का अधिकार था तथा भारतीय रियासतें भी इसी अनुपात में प्रतिनिधि भेज सकते थे।

इस मिशन का उद्देश्य कांग्रेस, मुस्लिम लीग, भारतीय रियासतों के राजाओं और धार्मिक तथा जातिय अल्पसंख्यकों, सभी वर्गों को सन्तुष्ट करने का था, किन्तु अपने प्रस्ताव से क्रिप्स मिशन किसी को भी सन्तुष्ट न कर सका।

 

कैबिनेट मिशन (1946)- कैबिनेट मिशन में भी तीन सदस्य पैथिक लारेन्स, ए.वी. अलेक्जेण्डर तथा स्टेफर्ड क्रिप्स सम्मिलित थे। कैबिनेट मिशन 24 मार्च 1946 को भारत पहुँचा तथा 16 मई 1946 को अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें निम्नलिखित योजनाएँ प्रस्तुत की गई थी-

v ब्रिटिश भारत और प्रान्तों को मिलाकर भारत का एक संघ होना चाहिए और कुछ राष्ट्रीय हितों के विषय को छोड़कर अन्य सभी विषय प्रान्तों के अधिकार क्षेत्र में रहने चाहिए।

v भारत पर ब्रिटिश सरकार की प्रभुसत्ता को समाप्त कर देना चाहिए।

v भारतीय रियासतों को यह छूट होनी चाहिए, कि वे संघ में सम्मिलित हो या फिर स्वतन्त्र रहें।

v एक अन्तरिम सरकार की तत्काल स्थापना की जाय, जिसे भारत के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त हो।

v संविधान बनाने के लिए संविधान सभा का निर्वाचन शीघ्र होना चाहिए।

कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव को भारतीयों ने स्वीकार कर लिया।

संविधान की रचना(1947-1950)- कैबिनेट मिशन के अनुसार नवम्बर 1946 को संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव किया गया। कुल 296 सदस्यों में से 211 सदस्य कांग्रेस के चुन लिए गए और 73 मुस्लिम लीग तथा शेष स्थान खाली थे।

20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमन्त्री क्लीमेट एटली ने घोषणा की, कि 30 जून 1947 को भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त हो जायेगा और सत्ता भारतीयों के हाथ में सौप दी जायेगी। मुस्लिम लीग ने आन्दोलन किया और भारत विभाजन की माँग की।

3 जून 1947 को ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट किया की, 1946 में गठित संविधान सभा द्वारा बनाया गया संविधान उन क्षेत्रों में लागू नही होगा, जो इसे स्वीकार नही करेंगें। उसी दिन 3 जून 1947 को वायसराय लार्ड माउण्ट बेटन ने विभाजन की योजना पेश की, जिसे 3 जून प्रस्ताव या माउण्ट बेटन योजना कहा गया। इस योजना को कांग्रेस और मुस्लीम लीग ने स्वीकार कर लिया।

14,15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को भारत में ब्रिटिश शासन का अन्त हो गया और समस्त शक्तियों को दो नए स्वतन्त्र डोमिनियम(उपनिवेश) भारत और पाकिस्तान को दे दिया गया।

संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 389 होनी थी, जिसमें से 296 सीटें ब्रिटिश भारत और 93 सीटें देशी रियासतों को आवण्टित की जानी थी। ब्रिटिश भारत को आवण्टित 296 सीटों में 292 सदस्यों का चयन 11 गवर्नरों के प्रान्तों और 4 का चयन मुख्य आयुक्तों के प्रान्त से किया जाना था।

संविधान सभा के लिए चुनाव जुलाई-अगस्त 1946 में हुआ। मुस्लिम लीग ने बैठक का बहिष्कार किया और अलग पाकिस्तान की मांग पर बल दिया, इसलिए बैठक में केवल 211 सदस्यों ने भाग लिया। सबसे वरिष्ठ सदस्य डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष चुना गया और एच. सी. मुखर्जी को 11 दिसम्बर 1946 को हुई दूसरी बैठक में उपाध्यक्ष व डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष चुना गया। बी.एन. राव को संवैद्धानिक सलाहकार नियुक्त किया गया।

प्रत्येक ब्रिटिश प्रान्त को आवण्टित की गई सीटों का निर्धारण तीन समुदायों के बीच उनकी जनसंख्या के अनुपात में किया जाना था। ये समुदाय मुस्लिम, सिक्ख और सामान्य थे। हर प्रान्त और देशी रियासतों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आवण्टित की जानी थी। मोटे तौर पर कहा जाय तो प्रत्येक 10 लाख लोगों पर एक सीट का आवण्टन किया जाना था।

यद्यपि संविधान सभा का चुनाव भारत के व्यस्क मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रुप से नही हुआ, तथापि इसमे प्रत्येक समुदाय हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, पारसी, आंग्ल भआरतीय, अनुसूचित जाति, और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधियों को जगह मिली।

महात्मा गाँधी और मोहम्मद अली जिन्ना में अपवाद को छोड़ दे, तो सभा में उस समय सभी बड़ी हस्तियाँ शामिल थी। जिनमें पंद्रह महिलाएं भी थी। जो निम्नलिखित है-

बेगम एजाज रसूल                      दश्कयानी वेलायुद्धन                  रेणुका रे

राजकुमारी अमृत कौर                 पूर्णिमा बनर्जी                           मालती चौधरी

लीला राय                                  सरोजनी नायडू                           सुचेता कृपलानी

विजयलक्ष्मी पण्डित                     कमला चौधरी                            हंसा मेहता

दुर्गा बाई देशमुख                       एनी मस्कारेनी                            अम्मू स्वामीनाथन

13 दिसम्बर 1946 को पण्डित जवाहर लाल नेहरु ने उद्देश्य प्रस्ताव को प्रस्तुत किया। इसमें संवैधानिक संरचना के ढ़ाँचे एवं दर्शन की झलक थी। इस प्रस्ताव को 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। इसके परिवर्तन रुप से संविधान की प्रस्तावना बनी।

मुस्लिम लीग के सदस्य भारतीय संविधान सभा से अलग हो गये। जो 1946 में माउण्ट बेटन योजना के तहत तय की गई। सदस्यों की कुल संख्या 389 सीटों के बजाय 299 हो गई। भारतीय प्रान्तों की संख्या 296 से 229 हो गई और देशी रियासतों की संख्या 93 से 70 हो गई।

भारतीय संविधान सभा के प्रथम एवं द्वितीय बैठकों की महत्वपूर्ण बातें-

 प्रथम बैठक (9 दिसम्बर)                                द्वितीय बैठक (11 दिसम्बर)

अस्थायी अध्यक्ष- डॉ सच्चिदानन्द सिन्हा            स्थायी अध्यक्ष- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

कुल सदस्य-389                                           कुल सदस्य-299

ब्रिटिश भारत-296                                         ब्रिटिश भारत-229

देशी रियासत-93                                           देशी रियासत-70

मुस्लिम लीग-73                                            मुस्लिम लीग-0

 

Notes-

v मई 1949 में राष्ट्रमण्डल ने भारत की सदस्यता का सत्यापन किया।

v 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया गया।

v 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत अपनाया गया।

v 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारत के पहले राष्ट्रपति के रुप में चुना गया।

v 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में संविधान सभा की कुल 11 अधिवेशन हुए। संविधान निर्माताओं ने लगभग 60 देशों के संविधान का अवलोकन किया और इसके प्रारुप पर 114 दिन तक विचार किया गया। संविधान निर्माण में कुल लगभग 64 लाख तक खर्च आया।

v 26 नवम्बर 1949 तक संविधान कार्य पूरा कर लिया गया तथा उसी दिन प्रवृत्ति(लागू) कर दिया गया और 26 जनवरी 1949 को पूर्णतः लागू कर दिया गया।

संविधान सभा की समितियाँ-

समिति                                                                             अध्यक्ष

संघ शक्ति समिति                                                             पण्डित जवाहरलाल नेहरु

संघीय संविधान समिति                                                      पण्डित जवाहरलाल नेहरु

राज्यों के लिए समिति                                                        पण्डित जवाहरलाल नेहरु

प्रान्तीय संविधान समिति                                                     सरदार वल्लभभाई पटेल

मौलिक अधिकारों एवं अल्पसंख्यकों सम्बन्धी परामर्श समिति सरदार वल्लभभाई पटेल

मौलिक अधिकार उपसमिति                                               जे. बी. कृपलानी

अल्पसंख्यक उपसमिति                                                     एच. सी. मुखर्जी

प्रक्रिया नियम समिति                                                        डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

संचालन समिति                                                                डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

प्रारूप समिति (Draft Committee)- इसका गठन 29 अगस्त 1947 को हुआ। जिसमें अध्यक्ष सहित कुल सात सदस्य थे।

1.भीमराव राम जी अम्बेडकर

2.एन. गोपालस्वामी अयंगर

3.डॉ. के.एम.मुंशी

4.सैय्यद मुहम्मद सादुल्ला

5.एन. माधव राव (इन्होंने बी.एल.मित्र की जगह ली, जिन्होंने स्वास्थ्य कारणों से त्यागपत्र दे दिया था।

6. अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर

7. टी.टी. कृष्णामाचारी (इन्होंने 1948 में डी.पी. खेतान की मृत्यु के बाद उनकी जगह ली।)

संविधान का प्रभाव में आना- संविधान के प्रारूप पर देश इस प्रस्ताव को 26 नवम्बर 1949 में पारित कर घोषित कर दिया गया। इस पर अध्यक्ष व सदस्यों के हस्ताक्षर लिए गए। सभा में कुल 299 सदस्यों में से उस दिन केवल 284 सदस्य उपस्थित थे, जिन्होंने संविधान पर हस्ताक्षर किये। 26 नवम्बर 1949 में अपनाए गए संविधान में प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ थी।

संविधान का शेष प्रावधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और इसे गणतन्त्र दिवस के रुप में मनाया गया। इस दिन को इसलिए चुना गया, क्योंकि 26 जनवरी 1930 को भारतीय राष्टरीय कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन(1929) में पारित हुए संकल्प के आधार पर पूर्ण स्वराज दिवस मनाया था।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर को पहले विधि मन्त्री, संविधान के पिता और आधुनिक मनु की संज्ञा दी गई।

संविधान की प्रकृति-संविधान वेत्ताओं ने संविधान को मुख्यतः दो प्रकार में बाँटा गया है-

 परिसंघात्मक(Conservative)- परिसंघात्मक संविधान, वह संविधान है। जिसमें शक्तियाँ केन्द्र व राज्यों में विभाजित रहती है और दोनों सरकारें अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतन्त्र रुप से कार्य करती है।

एकात्मक(Unitary)- एकात्मक संविधान, वह संविधान है, जिसके अन्तर्गत सारी शक्तियाँ एक ही सरकार में निहित होती है। जो प्रायः केन्द्र सरकार होती है।

परिसंघात्मक संविधान के आवश्यक तत्व-

v शक्तियों का विभाजन

v संविधान की सर्वोच्चता

v लिखित संविधान

v संविधान की अपरिवर्तनशीलता

v न्यायपालिका का प्राधिकार

कथन-

 

v प्रो. के. सी. वेयर- “भारतीय संविधान के लिए अर्द्धसंघीय या संघात्मक कम एकात्मक अधिक जैसी पदावली का प्रयोग करते है।“

v आइवर जेनिंग्स- “एक ऐसा संघ, जिसमें केन्द्रीयकरण की सशक्त प्रवृत्ति हो अर्थात परिसंघ कल्प”

v एस.आर.बोम्मई बनाम भारतीय संघ- भारत संघ के मामले में सुप्रीम कोर्ट के बहुमत न्यायाधीशों का यह अभिमत है, कि “भारतीय संविधान एक परिसंघात्मक संविधान है और परिसंघवाद संविधान का आधारभूत ढ़ाँचा है।“

संविधान का प्रवर्तन-  26 नवम्बर 1949 को तत्काल प्रभाव से कुल 16अनुच्छेद लागू हो गए। 26 नवम्बर 1949 को नागरिकता, चुनाव तदर्थ(कुछ समय के लिए)संसद, अस्थायी और परिवर्तनशील के अन्तर्गत अनुच्छेद-5. 6, 7, 8, 9, 60, 324, 366, 367, 379, 380, 388, 391, 391, और  393 स्वतः लागू हो गये थे।