उद्देशिका या
प्रस्तावना (PREAMBLE)
श्री सुब्बाराव के शब्दों में- उद्देशिका किसी एक्ट के मुख्य आदर्शों एवं आकांक्षाओं
का उल्लेख करती है।
सुप्रीम कोर्ट के शब्दों में- सुप्रीम कोर्ट के अनुसार उद्देशिका संविधान निर्माताओं
के विचारों को जानने की कुंजी है।
बेरुबारी मामले में(1960)- बेरुबारी के
मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि उद्देशिका संविधान का अंग नही
है।
केशनवानन्द भारती बनाम केरलराज्य (1973)- केशवानन्द भारती के मामले में उच्चतम न्यायालय ने
बेरुबारी को दिये निर्णय को उलटते हुए, यह निर्धारित किया की उद्देशिका संविधान का
एक अंग(भाग) है।
1. संविधान के अधिकार का स्त्रोत- हम भारत के लोग ........इस संविधान को अंगीकृत,
अधिनियमित और आत्मार्पित करते है। अर्थात ये शब्द लोगों के सर्वोच्च प्रभुता की
घोषणा करते है और इस बात की ओर संकेत करते है, कि संविधान का आधार उन लोगों का
प्राधिकार है।
2. भारत की प्रकृति- यह घोषणा करती है, कि भारत एक सम्प्रभु, समाजवादी, पंथ
निरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य व्यवस्था वाला देश है।
3. संविधान का उद्देश्य- न्याय, स्वतन्त्रता, समता एवं बन्धुत्व।
4. संविधान लागू होने की तिथि- 26 नवम्बर 1949, मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत
2006 विक्रमी।
5. संविधान का स्त्रोत- भारत के लोग ही संविधान के स्त्रोत है।
6. प्रस्तावना के मुख्य शब्द- प्रस्तावना में कुछ मुख्य शब्दों का उल्लेख है, जो
निम्नलिखित है-
·
प्रभुतासम्पन्न
(Sovereignty)- इस
शब्द का आशय है, कि भारत आन्तरिक व बाह्य दृष्टि से किसी भी विदेशी सत्ता के अधीन
नही है अर्थात इसके ऊपर और कोई शक्ति नही है।
·
लोकतान्त्रिक
(Democratic)-लोकतान्त्रिक सरकार जनता के लिए तथा जनता के द्वारा
स्थापित सरकार है। इसमें जनता द्वारा निर्वाचत प्रतिनिधि देश का शासन चलाते है।
·
पंथ
निरपेक्ष (Secular)- यह
शब्द 42वे संविधान संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा गया है। पंथ निरपेक्ष की धारणा
संविधान में प्रयुक्त विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता कि पदावली में पहले
से अन्तर नही थी। पंथ निरपेक्ष राज्य का तात्पर्य ऐसे राज्य से है, जो किसी विशेष
धर्म को राजधर्म के रुप में मान्यता प्रदान नही करता है, वरन् सभी धर्मों के साथ
समान व्यवहार करता है, तथा उन्हें समान संरक्षण प्रदान करता है।
·
समाजवाद
(Socialism)- यह
शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के तहत् जोड़ा गया। उद्देशिका में
प्रयुक्त आर्थिक न्याय पदावली में समाजवाद की अवधारणा अन्तर्निहीत है। इसकी कोई
निश्चित परिभाषा देना कठिन है। भारतीय समाजवाद लोकतान्त्रिक समाजवाद है, न कि साम्यवादी
समाजवाद जिसे राज्यश्रित समाजवाद भी कहा जाता है। जिसमें उत्पादन और वितरण के सभी
साधनों का राष्ट्रीयकरण और निरीह सम्पत्ति या साधनों का उन्मूलन शामिल है।
लोकतान्त्रिक समाजवाद मिश्रित अर्थव्यवस्था में आस्था रखता है, जहाँ सार्वजनिक और
निजी क्षेत्र साथ-साथ रहते है। अतएव भारत का संविधान प्राइवेट सम्पत्ति का उन्मूलन
नही करता, किन्तु उस पर कुछ निर्बन्धन लगाता है, जिससे उसका उपयोग राष्ट्रीय हित
में किया जा सके।
·
अखण्डता
(Integrity)- ये
शब्द भी 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया है। इस शब्द का समावेश पृथकतावादी
प्रवृत्तियों को रोकने के लिए किया गया है।
·
गणतन्त्र
(Republican)- इस शब्द से स्पष्ट है, कि भारत में वंशानुगत राजा की
परम्परा का अंत हो गया है अर्थात भारत का राज्यध्यक्ष जनता का अप्रत्यक्ष चुना हुआ
प्रतिनिधि होता है।
·
संविधान
का उद्देश्य (Purpose of
Constitution)- संविधान का
मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को निम्न अधिकार दिलाना है। न्याय(सामाजिक, राजानीतिक
और आर्थिक), स्वतन्त्रता, विचार, मत, विश्वास, उपासना।
·
समता
(Equality)- व्यक्ति की गरिमा और राज्य की स्वतन्त्रता।
7. उद्देशिका में संविधान (Constitution of Preamble)- केशवानन्द भारतीय बनाम केरल राज्य (1973) के मामले में
सरकार की ओर से तन्त्र दिया कि उद्देशिका भी संविधान का एक भाग है, इसलिए
अनुच्छेद-368 के तहत् इसमें संशोधन किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से यह निर्धारित किया कि,
उद्देशिका संविधान का भाग है, अतः यह संशोधनीय है, किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट
किया कि उद्देशिका के उस भाग को संशोधित नही किया जा सकता है, जो आधारभूत ढ़ाँचे
से सम्बन्धित हो।
8. प्रस्तावना में संशोधन की सम्भावना (Possibility of amendment in the preamble )- क्या
प्रस्तावना में संविधान के अनुच्छेद-368 के तहत् संशोधन किया जा सकता है। यह
प्रश्न पहली बार ऐतिहासिक केस केशवानन्द भारती(1973) के मामले में उठा। यह विचार
सामने आया कि इसमें संशोधन नही किया जा सकता, क्योंकि यह संविधान का भाग नही है।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि अनुच्छेद-368 के जरिए संविधान
के मूल तत्व व मूल विशेषताओं, जो कि प्रस्तावना में उल्लिखित है, को ध्वस्त करने
वाला संशोधन नही किया जा सकता है।
9. उद्देशिका का
महत्व (Importance
of Preamble)-
·
सुभाष
कश्यप- “संविधान शरीर
है, तो प्रस्तावना उसकी आत्मा, प्रस्तावना आधारशिला है, तो संविधान उस पर खड़ी
अट्टालिका।“
·
कृष्णा
स्वामी अय्यर- “संविधान
की उद्देशिका हमारी दीर्घकालिक सपनों का विचार है।“
·
के.एम.
मुंशी- “हमारी सम्प्रभु
लोकतान्त्रिक गणराज्य का भविष्यफल है।“
·
अर्नेस्ट
बेकर- “उद्देशिका
संविधान की कुंजी है।“ इन्होंने अपनी पुस्तक “Principle of Social and political theory” के प्रारम्भ में उल्लेख किया है।
·
पालकी
वाला- “उद्देशिका
संविधान का परिचय पत्र है।“
10. परिसंघ कल्प- संघ की सरकार, की शक्ति पर इतना बल दिया गया है, कि
उससे उन सिद्धान्तों पर प्रभाव पड़ता है। जो सामान्तया परिसंघ के आधार समझे जाते
है। इसके कारण एक विदेशी आलोचक प्रो. वेयर ने कहा है, कि- भारत का संविधान एक ऐसी शासन प्रणाली की
व्यवस्था करता है, जो कि परिसंघकल्प है। वह ऐकिक राज्य जिसमें कुछ अनुसंघीय
परिसंघीय लक्षण है, यह अनुसंघीय ऐकिक लक्षण परिसंघीय राज्य नही है।
‘भारत का संविधान न तो शुद्ध रुप से परिसंघीय है और न तो
शुद्ध रुप से ऐकिक, यह दोनों का समायोजन है। यह एक नये प्रकार का संघ या सम्मिलित
राज्य है। इसमें यह सिद्धान्त अन्तर्विष्ट है, कि परिसंघ होते हुए भी राष्ट्रीय
हित सर्वोच्च होना चाहिए।‘
11. संविधान के विशिष्ट लक्षण- संविधान के इतने विशान होने के अनेक निम्नलिखित कारण
है।
·
विभिन्न
संविधानों के संचित अनुभवों का समावेश।
·
विस्तृत
प्रशासनिक उपबन्ध भी शामिल किये गये है- भारतीय संविधान के रचयिता शासन के मूल सिद्धान्तों को
अधिनियमित करने से ही सन्तुष्ट नही हुए, उन्होंने प्रशासनिक बातों के ब्योरे का
उपबन्ध करने के लिए भारत शासन अधिनियम 1935 को अंशतः अपना लिया।
डॉ.
भीमराव अम्बेडकर के शब्दों में- “प्रशासन के रुप में परिवर्तन किये बिना संविधान
का दुरुपयोग करना बिल्कुल सम्भव है।“
·
इकाईयों
का संविधान भी सम्मिलित है-
भारत में संविधान के संघ और इकाई दोनों के संविधान सम्मिलित है। परिसंघ की इकाईयों
का ऐतिहासिक उद्भव और राजनीतिक विकास अलग-थलग था,इसलिए विभिन्न वर्ग की इकाई के
लिए विभिन्न उपबन्ध बनाये गये।
·
परिसंघीय
संबन्धों पर विस्तार से विचार-
इकाईयों से सम्बन्धित उपबंध तो विस्तार से बनाये ही गये है, साथ ही परिसंघ और
इकाईयों के बीच और इकाईयों में परस्पर सम्बन्ध के उपबन्ध भी विस्तार से बनाये गये
है। ये सम्बन्ध विधायी या प्रशासनिक दोनों ही है।
·
प्रवर्तनीय
और अप्रवर्तनीय दोनों प्रकार के अधिकार सम्मिलित किये गये हो- अमेरीकी संविधान के संशोधनों के नमूने पर एक अधिकार
विलेख है, जिसमें व्यक्ति को न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय मूल अधिकार प्राप्त है,
इसके अतिरिक्त नीति निदेशक तत्वों को समाविष्ट करने वाला एक भाग भी है, जो व्यक्ति
को न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय अधिकार प्रदान नही करता, किन्तु उन्हें देश के शासन
में मूलभूत समझा जाता है।
·
लचीला
अधिक कठोर कम- भारतीय
संविधान का एक विशेष लक्षण यह भी है, कि वह लिखित परिसंघ संविधान को लचिलापन
प्रदान करता है। संविधान के गिने-चुने उपबन्धों के संशोधन के लिए ही राज्य
विधानमण्डलों से अनुसमर्थन की अपेक्षा है और तब भी आधे विधानमण्डलों का समर्थन ही
पर्याप्त है, शेष संविधान का संशोधन संघी की संसद के विशेष बहुमत से किया जा सकता
है अर्थात प्रत्येक सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत
से और यह बहुमत सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत भी होना चाहिए। संसद को संविधान
के बहुमत से उपबन्धों में साधारण बहुमत से परिवर्तन या उपान्तर करने की शक्ति दी
गई है। साधारण विधेयक के लिए भी इतनी ही अपेक्षा होती है। लचीलेपन का उदाहरण
संविधान में संसद को विधान बनाकर संविधान की अनुपूर्ति करने के लिए दी गई
शक्तियाँ।










