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रविवार, 16 अगस्त 2020

भारत के राष्ट्रपतियों की सूची तथा राष्ट्रपति का वीटो पावर

राष्ट्रपति का वीटो पावर (अनुच्छेद-111)

संसद द्वारा पारित कोई भी विधेयक तभी अधिनियम बनता है, जब राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति दे दे। जब ऐसी अनुमति के लिए राष्ट्रपति के पास विधेयक भेजा जाता है, तो उसके पास तीन विकल्प होते है-
1. आत्यांतिक वीटो (Absolute Veto)- जब किसी विधेयक पर राष्ट्रपति अपनी अनुमति नही देता तो विधेयक समाप्त हो जाता है। और अधिनियम नही बन पाता। यह निम्न दो मामलों में होता है-
Ø गैर-सरकारी विधेयकों के सम्बन्ध में,
Ø सरकारी विधेयक के सम्बन्ध में जब मंत्रिमण्डल त्यागपत्र दे दे और नया मंत्रिमण्डल राष्ट्रपति को ऐसे विधेयक पर सहमति न देने की सलाह दे।
सर्वप्रथम इस शक्ति का प्रयोग 1954ई. में ‘पेप्सू विनियोग विधेयक’ के मामले में, भारत के पहले राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा किया गया था।
2. निलम्बनकारी वीटो (Suspension Veto)- अनुच्छेद-111 के तहत राष्ट्रपति किसी भी विधेयक (धन विधेयक एवं संविधान संशोधन विधेयक को छोड़कर) संसद में पुनर्विचार के लिए वापस कर सकता है। परन्तु जब संसद बिना संशोधन के पुनः अनुमति के लिए विधेयक को भेजती है, तो राष्ट्रपति उस पर अनुमति देने के लिए बाध्य है।
इस वीटो पावर का सर्वप्रथम प्रयोग 1991ई. में राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने संसद सदस्यों के वेतन भत्ते एवं पेंशन संशोधन विधेयक के सम्बन्ध में किया था। तत्पश्चात् 1997ई. में राष्ट्रपति डॉ के. आर. नारायणन ने उत्तर प्रदेश तथा बिहार पर राष्ट्रपति शासन लगाने के सम्बन्ध में तथा 2006 में डा. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने सांसद (अयोग्यता निवारण) संशोधन विधेयक के सम्बन्ध में अपनी शक्ति का प्रयोग किया गया।
3. पॉकेट वीटो (Poket Veto)- संविधान के तहत् किसी विधेयक पर राष्ट्रपति द्वारा अनुमति देने या न देने के लिए किसी समय सीमा का प्रतिबन्ध नही है। अर्थात जब राष्ट्रपति किसी विधेयक पर अनुमति नही देता है या पुनर्विचार के लिए संसद को वापस नही करता है तब वह जेबी वीटो शक्ति का प्रयोग करता है।

इस शक्ति का प्रयोग सर्वप्रथम राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने 1986ई. में भारतीय डाक संशोधन विधेयक के सम्बन्ध में किया था।

                   List of the Indian president 

भारत के  राष्ट्रपति, कार्यकाल एवं उनकी विशेषताएँ

क्र.

   नाम

         कार्यकाल

      विशिष्टताएँ

1.

डॉ.राजेन्द्र प्रसाद

26 जनवरी,1950 से 13 मई, 1962

भारत के प्रथम राष्ट्रपति

2.

डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन

13 मई,1962 से 13 मई, 1967

भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति

3.

डॉ. जाकिर हुसैन

13 मई,1967 से 13 मई,1969

कार्यकाल के दौरान मृत्यु

4.

वी.वी. गिरि

3 मई, 1969 से 20 जुलाई, 1969

भारत के प्रथम कार्यवाहक राष्ट्रपति

5.

न्यायमूर्ति एम हिदायतुल्ला

20 जुलाई, 1969 से 24 अगस्त, 1969

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश  (कार्यवाहक)

6.

वी.वी. गिरि

24 अगस्त,1969 से 14 अगस्त, 1974

द्वितीय चक्र की मतगणना

7.

फखरुद्दीन अली अहमद

24 अगस्त, 1974 से 11 फरवरी, 1977

कार्यकाल के दौरान मृत्यु

8.

बी. डी.जत्ती

11 फरवरी, 1977 से 25 जुलाई, 1977

तृतीय कार्यवाहक राष्ट्रपति

9.

नीलम संजीव रेड्डी

25 जुलाई, 1977 से 25 जुलाई, 1982

निर्विरोध निर्वाचित

10.

ज्ञानी जैल सिंह

25 जुलाई, 1982 से 25 जिलाई, 1987

जेबी वीटो का सर्वप्रथम प्रयोग

11.

आर. वेकंटरमण

25 जुलाई, 1987 से 25 जुलाई, 1992/

सर्वाधिक आयु में राष्ट्रपति

12.

डॉ.शंकरदयाल शर्मा

25 जुलाई, 1992 से 25 जुलाई, 1997

चार प्रधानमन्त्रियों के साथ कार्य किया।

13.

डॉ. के. आर. नारायणन

25 जुलाई, 1997 से 25 जुलाई, 2002

प्रथम दलित राष्ट्रपति

14.

डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम

25 जुलाई, 2002 से 25  जुलाई, 2007

मिसाइल वैज्ञानिक

15.

प्रतिभा देवी सिंह पाटिल

25 जुलाई, 2007 से 25  जुलाई, 2012

प्रथम महिला राष्ट्रपति

16.

प्रणव मुखर्जी

25 जुलाई, 2012 से 25 जुलाई, 2017

 

17.

डॉ रामनाथ कोविंद

25 जुलाई, 2017 से अब तक

 



अन्य जानकारी के लिए क्लिक करें-

राष्ट्रपति की योग्यता और निर्वाचक मण्डल-
https://civileducation2000.blogspot.com/2020/06/blog-post_29.html

राष्ट्रपति की आपातकालीन एवं कार्यपालिकीय शक्तियाँ
https://civileducation2000.blogspot.com/2020/07/blog-post_6.html

राष्ट्रपति सम्बन्धी संवैधानिक अनुच्छेद-
https://civileducation2000.blogspot.com/2020/06/blog-post_24.html


रविवार, 9 अगस्त 2020

प्रमुख जनजातीय विद्रोह

 राजनीतिक-धार्मिक आन्दोलन

ऐसे आन्दोलन जिसके अन्तर्गत धार्मिक अवलम्बन लेकर समुदाय ,समाज तथा क्षेत्रीय शोषण और बाहरी प्रभाव को समाप्त कर अपनी व्यवस्थता स्थापित करना था, इसलिए इसे राजनीतिक-धार्मिक आन्दोलन की संज्ञा की दी गई। यथा-

Ø   सन्यासी विद्रोह (1763-1800)- गिरि सम्प्रदाय के सन्यासी लोगों पर तीर्थ स्थानों पर आने जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। 1770 ईस्वी में बंगाल में भयंकर अकाल में भू-राजस्व वसूलना तथा तीर्थयात्रा पर प्रतिबन्ध लगाना इस विद्रोह का प्रमुख कारण बना। इस विद्रोह का उल्लेख ‘वन्दे मातरम’ के रचयिता बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनन्दमठ’ में किया है। हिन्दू–मुस्लिम की एकता इस विद्रोह की प्रमुखता थी। इस विद्रोह के प्रमुख नेताओं में मजमून शाह, मूसा शाह, द्विजनारायण, भवानी पाठक, चिरागअली तथा देवी चौधरानी प्रमुख है।

Ø   फकीर विद्रोह (1776-1777)- इसके प्रमुख नेता मजमुन शाह और चिराग अली थे। ये लोग सूफी परम्पराओं से प्रभावित थे। इस विद्रोह का प्रमुख कारण जमींदारों और कृषकों से अत्यधिक लगान वसूली था। जो अकाल के दौरान की गई। इस विद्रोह का प्रमुख केन्द्र दीनाजपुर, मालदा व रंगपुर था। जेम्स रेनल ने मजमुन शाह को पराजित किया, जिसके पश्चात् चिराग अली ने इस का आन्दोलन का नेतृत्व किया। 19वीं शताब्दी के आरम्भ में ब्रिटिश सरकार ने इस विद्रोह को दबा दिया।

Ø   पागलपंथी विद्रोह (1813-1831)- पागलपंथी गारो जनजाति का एक अर्ध-धार्मिक सम्प्रदाय था जो उत्तर-पूर्व भारत में करमशाह द्वारा चलाया गया था। करमशाह का पुत्र टीपू मीर इस विद्रोह का नेता था जिसने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया।1813 में जमींदारों के विरुद्ध काश्तकारों के समर्थन में यह विद्रोह किया। किन्तु 1831 में इस विद्रोह को दबा दिया गया।

Ø   फरैजी विद्रोह (1818) – आधुनिक बांग्लादेश के फरीदपुर में हाजी शरीय तुल्ला के अनुयायियों, जिन्हें फरैजी की संज्ञा दी गई थी। यह आन्दोलन 1818 में प्रारम्भ किया गया। जिसका मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समाज में प्रचलित कुरीतियों को दूर करना था। शरीयतुल्ला के पुत्र दादूमीर ने इसका नेतृत्व किया। यह सम्प्रदाय भी जमींदारों द्वारा अपने किसानों पर अत्याचार के विरोध में था। फरैजी विद्रोह 1838 से 1857 तक चलता रहा तथा अन्त तक इस सम्प्रदाय के अनुयायी वहाबी दल में सम्मिलित हो गए। फरैजियों की तुलना ‘रेड रिपब्लिकन्स’ से भी की गई है।

Ø   वहाबी विद्रोह (1820-1870)- वहाबी आन्दोलन मूलतः अरब देश में मोहम्मद-इब्न-अबल-ए वाहिब द्वारा (1703-1787) आरम्भ किया गया धार्मिक आंदोलन था। जिसका उद्देश्य दारूल हरबु(काफिरों का देश) को दारूल इस्लाम (मुसलमानों का देश) बनाकर इस्लाम प्रचार करना था। 1857 में इस आन्दोलन की शुरुआत हुई थी।उत्तर-पश्चिम से अफगान संकट उत्पन्न करने के डर के कारण 1860 में अंग्रेजों ने इसका दमन करना प्रारम्भ कर दिया। वहाबी आन्दोलन ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना करने के उद्देश्य से प्रेरित था। इसका स्वरुप पूर्णतः साम्प्रदायिक था।

Ø   कूका आन्दोलन(1840)- यह आन्दोलन भगत जवाहर मल उर्फ सेन साहब के नेतृत्व में पश्चिमी पंजाब में किया गया। प्रारम्भ में यह धार्मिक स्वरुप का था ,जिसने बाद में राजनीतिक रुप ले लिया। सेन साहब के शिष्य बालक सिंह इसका मुख्यालय हजारा में बनाया। बालक सिंह के शिष्य रामसिंह कूका ,जिन्हें गुरु गोविन्द सिंह का अवतार माना जाता है, ने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया। 1872 में रामसिंह को कैदकर रंगून निर्वासित कर दिया गया जहाँ 1885 में उनकी मृत्यु हो गई। नामधारी सिक्ख सम्प्रदाय की स्थापना 14 अप्रैल 1857 क भाइनी आराइया गाँव जिला लुधियाना में हुई, जिसकी स्थापना का श्रेय रामसिंह को दिया गया।

जनजातीय (आदिवासी ) विद्रोह

जानजातियों को पहली बार आदिवासी नाम से ठक्कर बापा सम्बोधित किया था। आदिवासी बाहरी लोगों को दिकू नाम से पुकारते थे। महाजन, जमींदारों व अधिकारियों के शोषण से क्षुब्ध होकर आदिवासियों ने निम्नलिखित विद्रोह कर दिये।

Ø   चुआर तथा हो विद्रोह(1768-72ई.)- इसे भूमि विद्रोह भी कहते है। चुआर लोग बंगाल में मेदिनीपुर जिले की आदिम जातियाँ थी। अकाल व बढ़े लगान के कारण इन्होंने हथियार उठा लिये। जिनका साथ दलभूम, कैलापाल, ढोल्का, व बाराभूम के राजाओं ने दिया था। इस आन्दोलन का नेतृत्व राजा जगन्नाथ व दुर्जन सिंह ने किया, जिन्होने लगान देना बंद कर दिया था। परन्तु 30वर्ष पश्चात् यह आन्दोलन समाप्त हो गया। इस आन्दोलन में छोटा नागपुर व सिंह भूमि जिले की हो जनजाति ने भी बढ़े राजस्व कर के कारण जमींदार व अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

Ø   पालीगारों का विद्रोह(1801-05ई.)- टीपू सुल्तान के हार के पश्चात् डिंडीगुल तथा मालाबार के पालीगारों ने अंग्रेजों की भूमि कर व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह किया। जिसके नेता वीर पी. कट्टवामन थे।

Ø   दीवान वेलुथम्पी का विद्रोह(1808-09ई.)- केरल के त्रावणकोर राजा ने लार्ड वेलेजली की सहायक संधि स्वीकार करने से मना कर दी तो अंग्रेजों ने राजा को अपदस्थ कर दिया, जिसका विरोध उसके दीवान बेलुथम्पी ने किया, इस विद्रोह का समर्थन नायर बटालियन ने भी किया। विद्रोह में संघर्षरत बेलुथम्पी घायल हो गये, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।

Ø   पाइक विद्रोह (1817-1825ई.)- पाइक लगान मुक्त भुमि का उपयोग करने वाले उड़ीसा के खुर्दा क्षेत्र के सैनिक थे। अंग्रेजों ने इस लगान मुक्त भूमि पर कर लगा दिया, जिसकी वसूली कड़ाई से की जाने लगी।खुर्दा के राजा पाइकों को साथ लेकर सन्1804 में विद्रोह कर दिया।और अग्रेजों को परास्त किया। कुछ वर्ष बाद 1817 में पाइकों ने जगबन्धु के नेतृत्व में पुनः विद्रोह किया, और अंग्रेज सेना को परास्त कर पुरी पर अधिकार कर लिया। परन्तु कठिन संघर्ष केअंग्रेजों ने पाइकों के विद्रोह का 1825 में दमन कर दिया।

Ø   भील विद्रोह (1818-21ई.)- भील विद्रोह 1818 ई. में खानदेश (महाराष्ट्र) से आरम्भ हुआ। भीलों की आदिम जाति पश्चिमी तट के खानदेश में रहती थी जहाँ अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया था। भीलों ने 1820 में दशरथ के नेतृत्व में विद्रोह किया, परन्तु अंग्रेजी सेना ने इसे दबा दिया।1822 में हिरिया के नेतृत्व में तथा 1825 में सेवरम के नेतृत्व में पुनः विद्रोह हुआ।इस प्रकार भीलों का यह विद्रोह 1857 तक जारी रहा। पुनः 1921 ई. में मोतीलाल तेजवार ने जमींदारों द्वारा ली जाने वाली बेट बेगार के विरोध में नीमड़ा गाँव में विशाल सम्मेलन आहूत किया, अंग्रेजों को पता चलने पर विद्रोह के दमन हेतु विशाल सेना भेजी। और मोतीलाल तेजवार को सेंट्रल जेल में डाल दिया गया। जो 1945 ई. में छूटे। इस दमन चक्र में कुल 1200 से अधिक भील मारे गये।

Ø   कच्छ का विद्रोह (1818-31ई.)- कच्छ के राजा भारमल को 1819 ई. में अंग्रेजों ने अपदस्थ कर उनके अल्पव्यस्क पुत्र को राजगद्दी पर बैठा दिया। तत्पश्चात् भारमल व उनके समर्थक सरदार झरेजा ने विद्रोह कर दिया। लम्बे संघर्ष के फलस्वरुप 1831 में भारमल को पुनः गद्दी मिल गई और वह शान्त हो गया।

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

वैदिक साहित्य के प्रमुख ग्रन्थ

  वैदिक साहित्य                     

वैदिक साहित्य से तात्पर्य चारों वेद, विभिन्न ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक एवं उपनिषदों से है। वैदिक साहित्य श्रुति नाम से विख्यात है। श्रुति का अर्थ “सुनकर लिखा हुआ साहित्य” है। जो ईश्वर ने ऋषियों को आत्म ज्ञान देकर उनकी रचना करवायी है। यह साहित्य ऋषियों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी अन्य ऋषियों को मिलता रहा, इसलिए इसे अपौरुषेय और नित्य कहाँ जाता है, पहले के तीन वेदों ऋग्वेद, सामवेद व यजुर्वेद को वेदत्रयी कहाँ जाता है।
1. ऋग्वेद                             
        यह आर्यों का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है। ऋक् का अर्थ है, “छन्दोवद्ध रचना या श्लोक” ऋग्वेद के सूक्तों में देवताओं की स्तुति हेतु भक्ति भाव भरे है। ऋग्वेद की रचना सम्भवतः सप्तसैन्धव प्रदेश में हुई है। इसमें कुल 10 मण्डल, 1028 सूक्त एवं 10580 मंत्र है। मंत्रों को ऋचा कहाँ जाता है। प्रत्येक सूक्त में तीन से सौ तक ऋचाएँ हो सकती है। वेदों का संकलन महर्षि कृष्ण द्वैपायन ने किया ,इसलिए इनका नाम वेदव्यास भी है। ऋग्वेद में कुल 25 नदियों का उल्लेख है। ऋग्वेद के नदी सूक्त में 21 नदियों का उल्लेख मिलता है, जिसमें सिन्धु नदी का सर्वाधिक बार उल्लेख है, परन्तु ऋग्वैदिक  आर्यो की सबसे पवित्र नदी सरस्वती थी। इसे नदीतमा नदियों में प्रमुख कहाँ गया है। ऋग्वेद के नदी सूक्त में 'विपासा(व्यास नदी )' का उल्लेख नही है। बल्कि इसके स्थान पर कश्मीर की मरुद्वृधा नदी का नाम मिलता है। ऋग्वेद में सरस्वती की सहायक दृष्द्वती नदी का उल्लेख है, इसकी पहचान आधुनिक चौतंग नदी से की जाती है।
ऋग्वेद के मन्त्रों का उच्चारण करके जो पुरोहित यज्ञ सम्पन्न कराता था उसे ‘होता’ कहाँ जाता था। ऋग्वेद के तीन पाठ मिलते है-
1. साकल- इसमें कुल 1017 सूक्त है।
2. बालखिल्य- इसे आठवें मण्डल का परिशिष्ट माना जाता है, जिसमें कुल 11 सूक्त है।
3. वाष्कल- इसमें कुल 56 सूक्त है, जो वर्तमान में उपलब्ध नही है।
ऋग्वेद के 2 से 7 तक के मण्डल सबसे पुराने माने जाते है। पहला, आठवाँ नौवाँ और दसवाँ मण्डल परवर्ती काल का है। दसवाँ मण्डल, जिसमें पुरुष सूक्त है वह सबसे बाद का है।
प्रत्येक मण्डल व उनसे सम्बन्धित ऋषि निम्नलिखित है।
मण्डल                               सम्बन्धित ऋषि
प्रथम                         मधुच्छन्दा, दीर्घतमा और अंगिरा    
द्वितीय                        गृत्समद        
तृतीय                         विश्वामित्र           
चतुर्थ                         वामदेव           
पांचवाँ                        अत्रि
छठाँ                          भारद्वाज
सातवाँ                        वशिष
आठवाँ                       कण्व ऋषि
नौवाँ                          पवमान अंगिरा
दसवाँ                         क्षुद्रसूक्तीय, महासूक्तीय
        
ऋग्वेद के तीसरे मण्डल में गायत्री मंत्र का उल्लेख मिलता है, चौथे मण्डल कृषि से सम्बन्धित जानकारियाँ उल्लिखित है, आठवाँ मण्डल 11 सूक्तों का बालखिल्य का परिशिष्ट माना जाता है।तथा नौवे मण्डल में सोम का वर्णन मिलता है।
ब्राह्मण ग्रंथ- ये वेदों का गद्य भाग है, जिससे वेदों को समझा जाता है। ऋग्वेद को दो ब्राह्मण ग्रन्थ है- ऐतरेय तथा कौषीतकी।
ऐतरेय के संकलनकर्ता महिदास थे उनकी माँ का नाम इतरा था, जससे ऐतरेय कहलाये और उनकी रचना ब्राह्मण ऐतरेय-ब्राह्मण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तथा कौषीतकी के संकलनकर्ता कुषीतक ऋषि थे।
आरण्यक- आरण्यक का अर्थ है कि वन में लिखा जाने वाला और इन्हें वन पुस्तक भी कहाँ जाता है। ऋग्वेद के दो आरण्यक ऐतरेय व कौषीतकी है।
उपनिषद्- यह शब्द ‘उप’ और ‘निष’ धातु से बना है। उप का अर्थ है समीप और निष का अर्थ है समीप अर्थात छात्र द्वारा गुरु के समीप बैठकर सीखा गया ज्ञान। ये वेदों का अन्तिम भाग है, जिन्हें वेदान्त कहाँ जाता है। कुल उपनिषदों का संख्या 108 है। और दस विशेष महत्व के है। ये दस उपनिषद्-  ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, छांदोग्य, वृहदारण्यक, ऐतरेय एवं तैत्तिरीय है। इनमें मुख्यतया आत्मा व ब्रह्म का वर्णन है। ऋग्वेद के दो उपनिषद् ऐतरेय और कौषीतकी है।
2. सामवेद-                          
                साम का अर्थ है गायन। इसमें कुल मन्त्रों की संख्या 1549 है। इन मंत्रों में इसके मूल केवल 75 मंत्र ही है, शेष ऋग्वेद से लिए गए है।इसलिए इसे ऋग्वेद से अभिन्न माना जाता है।
ऋग्वेद के मंत्रो का गायन करने वाला उद्गाता कहलाता है। इसी वेद में सप्त स्वरों (  सा, रे, गा, मा ) मिलता है।सामवेद की मुख्यतः तीन शाखाएँ है।
कौथुम, राणायनीय एवं जैमिनीय।
ब्राह्मण ग्रन्थ- सामवेद के मूलतः दो ब्राह्मण ग्रन्थ है- ताण्ड्य और जैमिनीय। ताण्ड्य ब्राह्मण बहुत बड़ा है, इसलिए इसे महब्राह्मण भी कहाँ जाता है। यह पच्चीस अध्यायों में विभक्त है, इसलिए इसे पंचविश भी कहाँ जाता है।षड्विश ब्राह्मण, ताण्ड्य ब्राह्मण के परिशिष्ट के रूप में है, इसे अद्भुत ब्राह्मण भी कहते है। तथा जैमिनीय ब्राह्मण में याज्ञिक कर्मकाण्ड का वर्णन किया गया है।
आरण्यक- इसके दो आरण्यक है- जैमिनीय व छांदोग्यारण्यक।
उपनिषद्- सामवेद के दो उपनिषद् है- छांदोग्य उपनिषद् व जैमिनीय उपनिषद्। जिनमें छांदोग्य उपनिषद् सबसे प्राचीन माना जाता है। जिसमें देवकी के पुत्र कृष्ण का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है। इसी उपनिषद् में प्रथम तीन आश्रमों तथा ब्रह्म व आत्मा के अभिन्नता के विषय में उद्दालक आरुणि एवं उनके पुत्र श्वेतकेतु के बीच विख्यात संवाद का वर्णन है।

3. यजुर्वेद-                    
यह एक कर्मकाण्डीय वेद है। जिसमें विभिन्न यज्ञों से सम्बन्धित अनुष्ठान विधियों का उल्लेख है। यह वेद चम्पू काव्य (गद्य व पद्य का मिश्रण) में रचित है। यजुर्वेद के कर्मकाण्डों को सम्पन्न कराने वाले पुरोहितों को ‘अध्वर्यु’ कहाँ जाता है। यजुर्वेद की दो शाखाएं है- शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद।
शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेयी संहिता भी कहते है। इसकी दो शाखाएं काण्व और माध्यदिन है। अधिकांश विद्वान शुक्ल यजुर्वेद को  वास्तविक वेद मानते है।
कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएं- काठक संहिता, कपिष्ठल संहिता, मैत्रेयी संहिता, तैत्तिरीय संहिता। कृष्ण यजुर्वेद के मंत्रों की व्याख्या गद्य में मिलती है।
ब्राह्मण ग्रन्थ- शुक्ल यजुर्वेद का केवल एक ब्राह्मण ग्रंथ, शतपथ ब्राह्मण है। यह सबसे प्राचीन तथा सबसे बड़ा ब्राह्मण माना जाता है। जिसके लेखक महर्षि याज्ञवल्क्य है। शतपथ ब्राह्मण में जल-प्लावन कथा, पुनर्जन्म का सिध्दान्त, पुरुरवा-उर्वशी आख्यान, रामकथा तथा आश्विन कुमार द्वारा च्यवन ऋषि को यौवन दान का वर्णन है। कृष्ण यजुर्वेद के ब्राह्मण का नाम तौत्तिरीय ब्राह्मण है।
आरण्यक- यजुर्वेद के आरण्यक वृहदारण्यक,तैत्तिरीय और शतपथ है।
उपनिषद्- यजुर्वेद के उपनिषद् वृहदारण्यक उपनिषद्, कठोपनिषद, ईशोपनिषद्, श्वेताश्वर उपनिषद्, मैत्रायण उपनिषद् एवं महानारायण उपनिषद् है।
वृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य-गार्गी का प्रसिद्ध संवाद, तैत्तिरीय उपनिषद् में अधिक अन्न उपजाओ एवं कठोपनिषद् में यम और नचिकेता के बीच प्रसिद्ध संवाद का वर्णन है। इस उपनिषद् में आत्मा को पुरुष कहा गया है।
4. अथर्ववेद-                
अथर्वा ऋषि के नाम पर इस वेद का नाम अथर्ववेद पड़ा। अंगिरस ऋषि के नाम पर इसका एक नाम अथर्वागिरस भी पड़ गया। अथर्व शब्द अथर  एवं वाणि शब्दों के संयोजन से बना है। जिसका तात्पर्य है जादू टोना कुछ विद्वान अथर्वन का वास्तविक अभिप्राय अग्नि उद्बोधन करने वाला पुरोहित मानते है। किसी यज्ञ में बाधा आने पर उसका निराकरण अथर्ववेद करता है। इसलिए इसे ब्रह्मवेद या श्रेष्ठवेद भी कहते है। इसके मंत्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को ब्रह्मा कहा जाता था। चारों वेदों में यह सर्वाधिक लोकप्रिय था। इस वेद में पद्य के साथ-साथ गद्य के भी अंश प्राप्त है।
अथर्ववेद में 20 अध्याय, 731सूक्त और 6000 मंत्र है। इस वेद में वशीकरण, जादू-टोना, मरण, भूत-प्रेतों आदि के मंत्र तथा अनेक प्रकार की औषधियों का भी वर्णन मिलता है। जिसमें विश्वासों और अन्धविश्वासों का वर्णन है। इसकी अधिकांश ऋचाएं दुरात्माओं या प्रेतात्माओं का मार्ग बताती है।
अथर्ववेद में मगध और अंग का उल्लेख सूदूरवर्ती प्रदेशों के रुप में किया गया है। इसी में सभा और समिति को दो पुत्रियां कहाँ गया है। इसमें परिक्षित का उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद की दो शाखाएं शौनक और पिप्पलाद है।
ब्राह्मण ग्रन्थ- इसका एकमात्र ब्राह्मण गोपथ ब्राह्मण है, जिसे गोपथ ऋषि ने संकलित किया है।
आरण्यक- अथर्ववेद का कोई आरण्यक नही है।
उपनिषद्- मुण्डकोपनिषद्, माण्डूक्योपनिषद्, प्रश्नोपनिषद्।
मुण्डकोपनिषद् में सत्यमेव जयते एवं यज्ञों को टूटी-फूटी नौकाओं के समान कहा गया है, जिसके द्वारा जीवन रुपी भवसागर को पार नही किया जा सकता, आदि का उल्लिखित है। माण्डुक्योपनिषद् सभी उपनिषदों में छोटा है।