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मंगलवार, 4 अगस्त 2020

वैदिक साहित्य के प्रमुख ग्रन्थ

  वैदिक साहित्य                     

वैदिक साहित्य से तात्पर्य चारों वेद, विभिन्न ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक एवं उपनिषदों से है। वैदिक साहित्य श्रुति नाम से विख्यात है। श्रुति का अर्थ “सुनकर लिखा हुआ साहित्य” है। जो ईश्वर ने ऋषियों को आत्म ज्ञान देकर उनकी रचना करवायी है। यह साहित्य ऋषियों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी अन्य ऋषियों को मिलता रहा, इसलिए इसे अपौरुषेय और नित्य कहाँ जाता है, पहले के तीन वेदों ऋग्वेद, सामवेद व यजुर्वेद को वेदत्रयी कहाँ जाता है।
1. ऋग्वेद                             
        यह आर्यों का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है। ऋक् का अर्थ है, “छन्दोवद्ध रचना या श्लोक” ऋग्वेद के सूक्तों में देवताओं की स्तुति हेतु भक्ति भाव भरे है। ऋग्वेद की रचना सम्भवतः सप्तसैन्धव प्रदेश में हुई है। इसमें कुल 10 मण्डल, 1028 सूक्त एवं 10580 मंत्र है। मंत्रों को ऋचा कहाँ जाता है। प्रत्येक सूक्त में तीन से सौ तक ऋचाएँ हो सकती है। वेदों का संकलन महर्षि कृष्ण द्वैपायन ने किया ,इसलिए इनका नाम वेदव्यास भी है। ऋग्वेद में कुल 25 नदियों का उल्लेख है। ऋग्वेद के नदी सूक्त में 21 नदियों का उल्लेख मिलता है, जिसमें सिन्धु नदी का सर्वाधिक बार उल्लेख है, परन्तु ऋग्वैदिक  आर्यो की सबसे पवित्र नदी सरस्वती थी। इसे नदीतमा नदियों में प्रमुख कहाँ गया है। ऋग्वेद के नदी सूक्त में 'विपासा(व्यास नदी )' का उल्लेख नही है। बल्कि इसके स्थान पर कश्मीर की मरुद्वृधा नदी का नाम मिलता है। ऋग्वेद में सरस्वती की सहायक दृष्द्वती नदी का उल्लेख है, इसकी पहचान आधुनिक चौतंग नदी से की जाती है।
ऋग्वेद के मन्त्रों का उच्चारण करके जो पुरोहित यज्ञ सम्पन्न कराता था उसे ‘होता’ कहाँ जाता था। ऋग्वेद के तीन पाठ मिलते है-
1. साकल- इसमें कुल 1017 सूक्त है।
2. बालखिल्य- इसे आठवें मण्डल का परिशिष्ट माना जाता है, जिसमें कुल 11 सूक्त है।
3. वाष्कल- इसमें कुल 56 सूक्त है, जो वर्तमान में उपलब्ध नही है।
ऋग्वेद के 2 से 7 तक के मण्डल सबसे पुराने माने जाते है। पहला, आठवाँ नौवाँ और दसवाँ मण्डल परवर्ती काल का है। दसवाँ मण्डल, जिसमें पुरुष सूक्त है वह सबसे बाद का है।
प्रत्येक मण्डल व उनसे सम्बन्धित ऋषि निम्नलिखित है।
मण्डल                               सम्बन्धित ऋषि
प्रथम                         मधुच्छन्दा, दीर्घतमा और अंगिरा    
द्वितीय                        गृत्समद        
तृतीय                         विश्वामित्र           
चतुर्थ                         वामदेव           
पांचवाँ                        अत्रि
छठाँ                          भारद्वाज
सातवाँ                        वशिष
आठवाँ                       कण्व ऋषि
नौवाँ                          पवमान अंगिरा
दसवाँ                         क्षुद्रसूक्तीय, महासूक्तीय
        
ऋग्वेद के तीसरे मण्डल में गायत्री मंत्र का उल्लेख मिलता है, चौथे मण्डल कृषि से सम्बन्धित जानकारियाँ उल्लिखित है, आठवाँ मण्डल 11 सूक्तों का बालखिल्य का परिशिष्ट माना जाता है।तथा नौवे मण्डल में सोम का वर्णन मिलता है।
ब्राह्मण ग्रंथ- ये वेदों का गद्य भाग है, जिससे वेदों को समझा जाता है। ऋग्वेद को दो ब्राह्मण ग्रन्थ है- ऐतरेय तथा कौषीतकी।
ऐतरेय के संकलनकर्ता महिदास थे उनकी माँ का नाम इतरा था, जससे ऐतरेय कहलाये और उनकी रचना ब्राह्मण ऐतरेय-ब्राह्मण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तथा कौषीतकी के संकलनकर्ता कुषीतक ऋषि थे।
आरण्यक- आरण्यक का अर्थ है कि वन में लिखा जाने वाला और इन्हें वन पुस्तक भी कहाँ जाता है। ऋग्वेद के दो आरण्यक ऐतरेय व कौषीतकी है।
उपनिषद्- यह शब्द ‘उप’ और ‘निष’ धातु से बना है। उप का अर्थ है समीप और निष का अर्थ है समीप अर्थात छात्र द्वारा गुरु के समीप बैठकर सीखा गया ज्ञान। ये वेदों का अन्तिम भाग है, जिन्हें वेदान्त कहाँ जाता है। कुल उपनिषदों का संख्या 108 है। और दस विशेष महत्व के है। ये दस उपनिषद्-  ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, छांदोग्य, वृहदारण्यक, ऐतरेय एवं तैत्तिरीय है। इनमें मुख्यतया आत्मा व ब्रह्म का वर्णन है। ऋग्वेद के दो उपनिषद् ऐतरेय और कौषीतकी है।
2. सामवेद-                          
                साम का अर्थ है गायन। इसमें कुल मन्त्रों की संख्या 1549 है। इन मंत्रों में इसके मूल केवल 75 मंत्र ही है, शेष ऋग्वेद से लिए गए है।इसलिए इसे ऋग्वेद से अभिन्न माना जाता है।
ऋग्वेद के मंत्रो का गायन करने वाला उद्गाता कहलाता है। इसी वेद में सप्त स्वरों (  सा, रे, गा, मा ) मिलता है।सामवेद की मुख्यतः तीन शाखाएँ है।
कौथुम, राणायनीय एवं जैमिनीय।
ब्राह्मण ग्रन्थ- सामवेद के मूलतः दो ब्राह्मण ग्रन्थ है- ताण्ड्य और जैमिनीय। ताण्ड्य ब्राह्मण बहुत बड़ा है, इसलिए इसे महब्राह्मण भी कहाँ जाता है। यह पच्चीस अध्यायों में विभक्त है, इसलिए इसे पंचविश भी कहाँ जाता है।षड्विश ब्राह्मण, ताण्ड्य ब्राह्मण के परिशिष्ट के रूप में है, इसे अद्भुत ब्राह्मण भी कहते है। तथा जैमिनीय ब्राह्मण में याज्ञिक कर्मकाण्ड का वर्णन किया गया है।
आरण्यक- इसके दो आरण्यक है- जैमिनीय व छांदोग्यारण्यक।
उपनिषद्- सामवेद के दो उपनिषद् है- छांदोग्य उपनिषद् व जैमिनीय उपनिषद्। जिनमें छांदोग्य उपनिषद् सबसे प्राचीन माना जाता है। जिसमें देवकी के पुत्र कृष्ण का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है। इसी उपनिषद् में प्रथम तीन आश्रमों तथा ब्रह्म व आत्मा के अभिन्नता के विषय में उद्दालक आरुणि एवं उनके पुत्र श्वेतकेतु के बीच विख्यात संवाद का वर्णन है।

3. यजुर्वेद-                    
यह एक कर्मकाण्डीय वेद है। जिसमें विभिन्न यज्ञों से सम्बन्धित अनुष्ठान विधियों का उल्लेख है। यह वेद चम्पू काव्य (गद्य व पद्य का मिश्रण) में रचित है। यजुर्वेद के कर्मकाण्डों को सम्पन्न कराने वाले पुरोहितों को ‘अध्वर्यु’ कहाँ जाता है। यजुर्वेद की दो शाखाएं है- शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद।
शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेयी संहिता भी कहते है। इसकी दो शाखाएं काण्व और माध्यदिन है। अधिकांश विद्वान शुक्ल यजुर्वेद को  वास्तविक वेद मानते है।
कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएं- काठक संहिता, कपिष्ठल संहिता, मैत्रेयी संहिता, तैत्तिरीय संहिता। कृष्ण यजुर्वेद के मंत्रों की व्याख्या गद्य में मिलती है।
ब्राह्मण ग्रन्थ- शुक्ल यजुर्वेद का केवल एक ब्राह्मण ग्रंथ, शतपथ ब्राह्मण है। यह सबसे प्राचीन तथा सबसे बड़ा ब्राह्मण माना जाता है। जिसके लेखक महर्षि याज्ञवल्क्य है। शतपथ ब्राह्मण में जल-प्लावन कथा, पुनर्जन्म का सिध्दान्त, पुरुरवा-उर्वशी आख्यान, रामकथा तथा आश्विन कुमार द्वारा च्यवन ऋषि को यौवन दान का वर्णन है। कृष्ण यजुर्वेद के ब्राह्मण का नाम तौत्तिरीय ब्राह्मण है।
आरण्यक- यजुर्वेद के आरण्यक वृहदारण्यक,तैत्तिरीय और शतपथ है।
उपनिषद्- यजुर्वेद के उपनिषद् वृहदारण्यक उपनिषद्, कठोपनिषद, ईशोपनिषद्, श्वेताश्वर उपनिषद्, मैत्रायण उपनिषद् एवं महानारायण उपनिषद् है।
वृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य-गार्गी का प्रसिद्ध संवाद, तैत्तिरीय उपनिषद् में अधिक अन्न उपजाओ एवं कठोपनिषद् में यम और नचिकेता के बीच प्रसिद्ध संवाद का वर्णन है। इस उपनिषद् में आत्मा को पुरुष कहा गया है।
4. अथर्ववेद-                
अथर्वा ऋषि के नाम पर इस वेद का नाम अथर्ववेद पड़ा। अंगिरस ऋषि के नाम पर इसका एक नाम अथर्वागिरस भी पड़ गया। अथर्व शब्द अथर  एवं वाणि शब्दों के संयोजन से बना है। जिसका तात्पर्य है जादू टोना कुछ विद्वान अथर्वन का वास्तविक अभिप्राय अग्नि उद्बोधन करने वाला पुरोहित मानते है। किसी यज्ञ में बाधा आने पर उसका निराकरण अथर्ववेद करता है। इसलिए इसे ब्रह्मवेद या श्रेष्ठवेद भी कहते है। इसके मंत्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को ब्रह्मा कहा जाता था। चारों वेदों में यह सर्वाधिक लोकप्रिय था। इस वेद में पद्य के साथ-साथ गद्य के भी अंश प्राप्त है।
अथर्ववेद में 20 अध्याय, 731सूक्त और 6000 मंत्र है। इस वेद में वशीकरण, जादू-टोना, मरण, भूत-प्रेतों आदि के मंत्र तथा अनेक प्रकार की औषधियों का भी वर्णन मिलता है। जिसमें विश्वासों और अन्धविश्वासों का वर्णन है। इसकी अधिकांश ऋचाएं दुरात्माओं या प्रेतात्माओं का मार्ग बताती है।
अथर्ववेद में मगध और अंग का उल्लेख सूदूरवर्ती प्रदेशों के रुप में किया गया है। इसी में सभा और समिति को दो पुत्रियां कहाँ गया है। इसमें परिक्षित का उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद की दो शाखाएं शौनक और पिप्पलाद है।
ब्राह्मण ग्रन्थ- इसका एकमात्र ब्राह्मण गोपथ ब्राह्मण है, जिसे गोपथ ऋषि ने संकलित किया है।
आरण्यक- अथर्ववेद का कोई आरण्यक नही है।
उपनिषद्- मुण्डकोपनिषद्, माण्डूक्योपनिषद्, प्रश्नोपनिषद्।
मुण्डकोपनिषद् में सत्यमेव जयते एवं यज्ञों को टूटी-फूटी नौकाओं के समान कहा गया है, जिसके द्वारा जीवन रुपी भवसागर को पार नही किया जा सकता, आदि का उल्लिखित है। माण्डुक्योपनिषद् सभी उपनिषदों में छोटा है।