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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

भारतीय संविधान का निर्माण

संविधान का निर्माण

भारत में संविधान सभा के गठन का विचार वर्ष ‘1934’ में पहली बार ‘एम. एन. राय’ ने रखा। 1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पहली बार भारत के संविधान के लिए अधिकारिक रुप से संविधान सभा के गठन की माँग की।

1938ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से पण्डित जवाहर लाल नेहरु ने घोषणा की, कि स्वतन्त्र भारत के संविधान का निर्माण व्यस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गयी संविधान सभा द्वारा किया जायेगा, जिसमें किसी का हस्तक्षेप नही होगा। नेहरुजी की इस माँग को ब्रिटिश सरकार ने सैद्धान्तिक रुप से स्वीकार किया और इसे अगस्त प्रस्ताव ‘1940’ के नाम से जाना जाता है।

क्रिप्स मिशन (1942)- जब ब्रिटिश सरकार को यह पूर्ण विश्वास हो गया, कि भारतीयों के मांगों की अधिक दिन तक उपेक्षा नही की जा सकती है। फलतः(इसके कारण) तत्कालीन प्रधानमन्त्री ‘चर्चिल’ ने स्टेफर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक दूत मण्डल भारत भेजा। जिसमें कुल तीन सदस्य थे। जिसमें पैथिक लॉरेन्स, ए.वी. अलेक्जेण्डर एवं स्टेफर्ड क्रिप्स सम्मिलित थे। जो क्रिप्स मिशन के नाम से जाना गया। क्रिप्स के प्रस्तावों के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने भारत के बारे में निम्नलिखित सुधारों की घोषणा की-

v द्वितीय विश्व युद्ध ‘1944’ की समाप्ति के पश्चात् एक निर्वाचित संविधान सभा की स्थापना की जायेगी।

v संविधान सभा में भारतीय राज्यों के प्रतिनिधि भी शामिल किये जायेंगे।

v ब्रिटिश सरकार इस प्रकार बनाए गए संविधान को निम्नलिखित शर्तों के साथ स्वीकार करेगी-

·        ब्रिटिश भारतीय प्रान्तों को यह अधिकार होगा कि वे चाहे तो इस संविधान को स्वीकार कर संघ में शामिल हो जाय या अपने लिए नये संविधान की रचना करें।

·        ब्रिटिश सरकार उनके संघ में शामिल होने के लिए कोई सिफारिश या दबाव नही डालेगी। ऐसे प्रान्तों द्वारा नए संविधान के निर्माण कर लेने पर ब्रिटिश सरकार उन्हें भारतीय संघ के समान ही स्थिति प्रदान करेगी।

·        संविधान सभा व ब्रिटिश सरकार के बीच एक सन्धि पत्र पर हस्ताक्षर किये जायेंगें, जिसमें ब्रटिश के हाथों से भारतीय शासन के हस्तान्तरण से उत्पन्न समस्याओं के हल की व्यवस्था होगी। सन्धि पत्र में सरकार द्वारा दिए गए वचनों के अनुसार जाति एवं भाषा सम्बन्धी अल्पसंख्यक वर्गों की सुरक्षा का भी प्रावधान था।

क्रिप्स मिशन ने संविधान निर्मात्री सभा के आकार को निश्चित कर दिया था। युद्ध समाप्ति के पश्चात् प्रान्तीय विधानसभाओं का चुनाव किया जाना था। जो संविधान निर्मात्री सभा के सदस्यों का चुनाव करती।

संविधान सभा के सदस्यों की संख्या प्रान्तीय विधानसभाओं की संख्या का 1/10 भाग से अधिक नही हो सकती।

प्रत्येक प्रान्त को अपनी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधि चुनने का अधिकार था तथा भारतीय रियासतें भी इसी अनुपात में प्रतिनिधि भेज सकते थे।

इस मिशन का उद्देश्य कांग्रेस, मुस्लिम लीग, भारतीय रियासतों के राजाओं और धार्मिक तथा जातिय अल्पसंख्यकों, सभी वर्गों को सन्तुष्ट करने का था, किन्तु अपने प्रस्ताव से क्रिप्स मिशन किसी को भी सन्तुष्ट न कर सका।

 

कैबिनेट मिशन (1946)- कैबिनेट मिशन में भी तीन सदस्य पैथिक लारेन्स, ए.वी. अलेक्जेण्डर तथा स्टेफर्ड क्रिप्स सम्मिलित थे। कैबिनेट मिशन 24 मार्च 1946 को भारत पहुँचा तथा 16 मई 1946 को अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें निम्नलिखित योजनाएँ प्रस्तुत की गई थी-

v ब्रिटिश भारत और प्रान्तों को मिलाकर भारत का एक संघ होना चाहिए और कुछ राष्ट्रीय हितों के विषय को छोड़कर अन्य सभी विषय प्रान्तों के अधिकार क्षेत्र में रहने चाहिए।

v भारत पर ब्रिटिश सरकार की प्रभुसत्ता को समाप्त कर देना चाहिए।

v भारतीय रियासतों को यह छूट होनी चाहिए, कि वे संघ में सम्मिलित हो या फिर स्वतन्त्र रहें।

v एक अन्तरिम सरकार की तत्काल स्थापना की जाय, जिसे भारत के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त हो।

v संविधान बनाने के लिए संविधान सभा का निर्वाचन शीघ्र होना चाहिए।

कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव को भारतीयों ने स्वीकार कर लिया।

संविधान की रचना(1947-1950)- कैबिनेट मिशन के अनुसार नवम्बर 1946 को संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव किया गया। कुल 296 सदस्यों में से 211 सदस्य कांग्रेस के चुन लिए गए और 73 मुस्लिम लीग तथा शेष स्थान खाली थे।

20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमन्त्री क्लीमेट एटली ने घोषणा की, कि 30 जून 1947 को भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त हो जायेगा और सत्ता भारतीयों के हाथ में सौप दी जायेगी। मुस्लिम लीग ने आन्दोलन किया और भारत विभाजन की माँग की।

3 जून 1947 को ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट किया की, 1946 में गठित संविधान सभा द्वारा बनाया गया संविधान उन क्षेत्रों में लागू नही होगा, जो इसे स्वीकार नही करेंगें। उसी दिन 3 जून 1947 को वायसराय लार्ड माउण्ट बेटन ने विभाजन की योजना पेश की, जिसे 3 जून प्रस्ताव या माउण्ट बेटन योजना कहा गया। इस योजना को कांग्रेस और मुस्लीम लीग ने स्वीकार कर लिया।

14,15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को भारत में ब्रिटिश शासन का अन्त हो गया और समस्त शक्तियों को दो नए स्वतन्त्र डोमिनियम(उपनिवेश) भारत और पाकिस्तान को दे दिया गया।

संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 389 होनी थी, जिसमें से 296 सीटें ब्रिटिश भारत और 93 सीटें देशी रियासतों को आवण्टित की जानी थी। ब्रिटिश भारत को आवण्टित 296 सीटों में 292 सदस्यों का चयन 11 गवर्नरों के प्रान्तों और 4 का चयन मुख्य आयुक्तों के प्रान्त से किया जाना था।

संविधान सभा के लिए चुनाव जुलाई-अगस्त 1946 में हुआ। मुस्लिम लीग ने बैठक का बहिष्कार किया और अलग पाकिस्तान की मांग पर बल दिया, इसलिए बैठक में केवल 211 सदस्यों ने भाग लिया। सबसे वरिष्ठ सदस्य डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष चुना गया और एच. सी. मुखर्जी को 11 दिसम्बर 1946 को हुई दूसरी बैठक में उपाध्यक्ष व डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष चुना गया। बी.एन. राव को संवैद्धानिक सलाहकार नियुक्त किया गया।

प्रत्येक ब्रिटिश प्रान्त को आवण्टित की गई सीटों का निर्धारण तीन समुदायों के बीच उनकी जनसंख्या के अनुपात में किया जाना था। ये समुदाय मुस्लिम, सिक्ख और सामान्य थे। हर प्रान्त और देशी रियासतों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आवण्टित की जानी थी। मोटे तौर पर कहा जाय तो प्रत्येक 10 लाख लोगों पर एक सीट का आवण्टन किया जाना था।

यद्यपि संविधान सभा का चुनाव भारत के व्यस्क मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रुप से नही हुआ, तथापि इसमे प्रत्येक समुदाय हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, पारसी, आंग्ल भआरतीय, अनुसूचित जाति, और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधियों को जगह मिली।

महात्मा गाँधी और मोहम्मद अली जिन्ना में अपवाद को छोड़ दे, तो सभा में उस समय सभी बड़ी हस्तियाँ शामिल थी। जिनमें पंद्रह महिलाएं भी थी। जो निम्नलिखित है-

बेगम एजाज रसूल                      दश्कयानी वेलायुद्धन                  रेणुका रे

राजकुमारी अमृत कौर                 पूर्णिमा बनर्जी                           मालती चौधरी

लीला राय                                  सरोजनी नायडू                           सुचेता कृपलानी

विजयलक्ष्मी पण्डित                     कमला चौधरी                            हंसा मेहता

दुर्गा बाई देशमुख                       एनी मस्कारेनी                            अम्मू स्वामीनाथन

13 दिसम्बर 1946 को पण्डित जवाहर लाल नेहरु ने उद्देश्य प्रस्ताव को प्रस्तुत किया। इसमें संवैधानिक संरचना के ढ़ाँचे एवं दर्शन की झलक थी। इस प्रस्ताव को 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। इसके परिवर्तन रुप से संविधान की प्रस्तावना बनी।

मुस्लिम लीग के सदस्य भारतीय संविधान सभा से अलग हो गये। जो 1946 में माउण्ट बेटन योजना के तहत तय की गई। सदस्यों की कुल संख्या 389 सीटों के बजाय 299 हो गई। भारतीय प्रान्तों की संख्या 296 से 229 हो गई और देशी रियासतों की संख्या 93 से 70 हो गई।

भारतीय संविधान सभा के प्रथम एवं द्वितीय बैठकों की महत्वपूर्ण बातें-

 प्रथम बैठक (9 दिसम्बर)                                द्वितीय बैठक (11 दिसम्बर)

अस्थायी अध्यक्ष- डॉ सच्चिदानन्द सिन्हा            स्थायी अध्यक्ष- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

कुल सदस्य-389                                           कुल सदस्य-299

ब्रिटिश भारत-296                                         ब्रिटिश भारत-229

देशी रियासत-93                                           देशी रियासत-70

मुस्लिम लीग-73                                            मुस्लिम लीग-0

 

Notes-

v मई 1949 में राष्ट्रमण्डल ने भारत की सदस्यता का सत्यापन किया।

v 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया गया।

v 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत अपनाया गया।

v 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारत के पहले राष्ट्रपति के रुप में चुना गया।

v 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में संविधान सभा की कुल 11 अधिवेशन हुए। संविधान निर्माताओं ने लगभग 60 देशों के संविधान का अवलोकन किया और इसके प्रारुप पर 114 दिन तक विचार किया गया। संविधान निर्माण में कुल लगभग 64 लाख तक खर्च आया।

v 26 नवम्बर 1949 तक संविधान कार्य पूरा कर लिया गया तथा उसी दिन प्रवृत्ति(लागू) कर दिया गया और 26 जनवरी 1949 को पूर्णतः लागू कर दिया गया।

संविधान सभा की समितियाँ-

समिति                                                                             अध्यक्ष

संघ शक्ति समिति                                                             पण्डित जवाहरलाल नेहरु

संघीय संविधान समिति                                                      पण्डित जवाहरलाल नेहरु

राज्यों के लिए समिति                                                        पण्डित जवाहरलाल नेहरु

प्रान्तीय संविधान समिति                                                     सरदार वल्लभभाई पटेल

मौलिक अधिकारों एवं अल्पसंख्यकों सम्बन्धी परामर्श समिति सरदार वल्लभभाई पटेल

मौलिक अधिकार उपसमिति                                               जे. बी. कृपलानी

अल्पसंख्यक उपसमिति                                                     एच. सी. मुखर्जी

प्रक्रिया नियम समिति                                                        डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

संचालन समिति                                                                डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

प्रारूप समिति (Draft Committee)- इसका गठन 29 अगस्त 1947 को हुआ। जिसमें अध्यक्ष सहित कुल सात सदस्य थे।

1.भीमराव राम जी अम्बेडकर

2.एन. गोपालस्वामी अयंगर

3.डॉ. के.एम.मुंशी

4.सैय्यद मुहम्मद सादुल्ला

5.एन. माधव राव (इन्होंने बी.एल.मित्र की जगह ली, जिन्होंने स्वास्थ्य कारणों से त्यागपत्र दे दिया था।

6. अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर

7. टी.टी. कृष्णामाचारी (इन्होंने 1948 में डी.पी. खेतान की मृत्यु के बाद उनकी जगह ली।)

संविधान का प्रभाव में आना- संविधान के प्रारूप पर देश इस प्रस्ताव को 26 नवम्बर 1949 में पारित कर घोषित कर दिया गया। इस पर अध्यक्ष व सदस्यों के हस्ताक्षर लिए गए। सभा में कुल 299 सदस्यों में से उस दिन केवल 284 सदस्य उपस्थित थे, जिन्होंने संविधान पर हस्ताक्षर किये। 26 नवम्बर 1949 में अपनाए गए संविधान में प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ थी।

संविधान का शेष प्रावधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और इसे गणतन्त्र दिवस के रुप में मनाया गया। इस दिन को इसलिए चुना गया, क्योंकि 26 जनवरी 1930 को भारतीय राष्टरीय कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन(1929) में पारित हुए संकल्प के आधार पर पूर्ण स्वराज दिवस मनाया था।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर को पहले विधि मन्त्री, संविधान के पिता और आधुनिक मनु की संज्ञा दी गई।

संविधान की प्रकृति-संविधान वेत्ताओं ने संविधान को मुख्यतः दो प्रकार में बाँटा गया है-

 परिसंघात्मक(Conservative)- परिसंघात्मक संविधान, वह संविधान है। जिसमें शक्तियाँ केन्द्र व राज्यों में विभाजित रहती है और दोनों सरकारें अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतन्त्र रुप से कार्य करती है।

एकात्मक(Unitary)- एकात्मक संविधान, वह संविधान है, जिसके अन्तर्गत सारी शक्तियाँ एक ही सरकार में निहित होती है। जो प्रायः केन्द्र सरकार होती है।

परिसंघात्मक संविधान के आवश्यक तत्व-

v शक्तियों का विभाजन

v संविधान की सर्वोच्चता

v लिखित संविधान

v संविधान की अपरिवर्तनशीलता

v न्यायपालिका का प्राधिकार

कथन-

 

v प्रो. के. सी. वेयर- “भारतीय संविधान के लिए अर्द्धसंघीय या संघात्मक कम एकात्मक अधिक जैसी पदावली का प्रयोग करते है।“

v आइवर जेनिंग्स- “एक ऐसा संघ, जिसमें केन्द्रीयकरण की सशक्त प्रवृत्ति हो अर्थात परिसंघ कल्प”

v एस.आर.बोम्मई बनाम भारतीय संघ- भारत संघ के मामले में सुप्रीम कोर्ट के बहुमत न्यायाधीशों का यह अभिमत है, कि “भारतीय संविधान एक परिसंघात्मक संविधान है और परिसंघवाद संविधान का आधारभूत ढ़ाँचा है।“

संविधान का प्रवर्तन-  26 नवम्बर 1949 को तत्काल प्रभाव से कुल 16अनुच्छेद लागू हो गए। 26 नवम्बर 1949 को नागरिकता, चुनाव तदर्थ(कुछ समय के लिए)संसद, अस्थायी और परिवर्तनशील के अन्तर्गत अनुच्छेद-5. 6, 7, 8, 9, 60, 324, 366, 367, 379, 380, 388, 391, 391, और  393 स्वतः लागू हो गये थे।


गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

भारतीय संविधान ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

        ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास का काल सन् 1600ई. से प्रारम्भ होता है। इसी वर्ष इंग्लैण्ड में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की गई थी। संविधान के विकास काल को हम पाँच भागों में बाँट सकते है-

1.     1600ई. – 1765ई.

2.     1765ई. – 1858ई.

3.     1858ई. – 1919ई.

4.     1919ई. – 1947ई.

5.     1947ई. – 1949ई.

1. (1600ई. – 1765ई.) अंग्रेजों का भारत आगमन-

ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना 1600ई. में इंग्लैण्ड की महारानी एलिजावेथ के शासनकाल में हुआ था। इस काल को इंग्लैण्ड के इतिहास में स्वर्ण काल कहा जाता है। इस कम्पनी की स्थापना महारानी के राजलेख द्वारा की गई। भारत में कम्पनी का पहला व्यापारिक केन्द्र सूरत था।

1726 का राजलेख-

·        इस राजलेख द्वारा कलकत्ता, बम्बई और मद्रास प्रेसीडेन्सी के राज्यपाल एवं उसकी परिषद् को विधि बनाने की शक्ति प्रदान की गई।

·         1757ई. में अंग्रेज प्लासी की लड़ाई में बंगाल नवाब सिराजुद्दौला को हराकर बंगाल प्रान्त में वास्तविक शासक बन बैठे। प्लासी की जीत से ही भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव पड़ी।

2. (1765ई. – 1858ई.) ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना-

1773 का रेग्यूलेटिंग एक्ट-

·        इस एक्ट द्वारा बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल बना दिया गया एवं उसकी सहायता हेतु चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद् का गठन किया गया।

·        बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स बना। इस एक्ट द्वारा मद्रास एवं बम्बई के गवर्नर, बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन हो गए।

·        इस एक्ट के अन्तर्गत कलकत्ता में 1774ई. में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई। जिसमें एक मुख्य जज (एलिजाह इम्पे) एवं तीन अन्य जज (चैम्बर्स, लिमेस्टर एवं हाइड) थे तथा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध अपील प्रिवी काउंसिल में की जाती थी। 

1781 का एक्ट ऑफ सेटलमेन्ट-

·        इस एक्ट को रेग्यूलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने हेतु पारित किया था। इस एक्ट ने कलकत्ता की सरकार को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के लिए विधि बनाने का प्राधिकार किया।

1784 का पिट्स इण्डिया एक्ट-

·        इस एक्ट में कम्पनी के राजनैतिक एवं वाणिज्यिक कार्यों को पृथक-पृथक कर दिया। इसने निदेशक मण्डल को कम्पनी के व्यापारिक मामलों के अधीक्षण की अनुमति तो दे दी, परन्तु राजनैतिक मामलों के प्रबन्धन हेतु “नियन्त्रण बोर्ड” नाम से एक नये निकाय का गठन किया। इस प्रकार द्वैध शासन व्यवस्था शुरु हुई।

·        यह एक्ट दो कारणों से महत्वपूर्ण था। पहला कि भारत में कम्पनी के अधीन क्षेत्र को पहली बार ब्रिटिश अधिपत्य का क्षेत्र कहा गया। दूसरा कि ब्रिटिश सरकार को भारत में कम्पनी कार्यों और प्रशासन पर पूर्ण नियन्त्रण प्रदान किया गया हो।

1793 का चार्टर एक्ट-

·        इस चार्टर एक्ट ने कम्पनी व्यापार की अवधि को 20वर्षों के लिए बढ़ा दिया।

1813 का चार्टर एक्ट-

·        इसके द्वारा कम्पनी का भारत में व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया तथा सभी ब्रिटिश निवासियों को भारत में व्यापारिक छूट दे दी गई तथा कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास की सरकारों द्वारा बनाई गी विधियों का ब्रिटिश संसद द्वारा अनुमोदन किया जाना अनिवार्य कर दिया गया।

1833 का चार्टर एक्ट-

·        इसमें बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया। जिसमें सभी नागरिक व सैन्य शक्तियाँ निहित थी।

·        इसके अन्तर्गत पहली बार सिविल सर्विस के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता के आयोजन का प्रयास किया गया। हालांकि बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर के विरोध के कारण इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया।

1853 का चार्टर एक्ट-

·        सर्वप्रथम सम्पूर्ण भारत के लिए एक विधानमण्डल की स्थापना की गई, जिसमें सिविल सेवकों की भर्ती एवं चयन हेतु खुली प्रतियोगिता का शुभारम्भ किया गया। इस प्रकार विशिष्ट सिविल सेवा भारतीय नागरिक के लिए भी खोल दी गई और इसके लिए 1854ई. में मैकाले समिति का गठन किया गया।

·        इसने भारतीय शासन को सम्राट को हस्तान्तरित करने का मार्ग प्रशस्त किया। 1857 के विद्रोह ने इस प्रक्रिया को और भी तीव्र गति प्रदान की और ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन समाप्त कर दिया।

3. (1858ई.- 1919ई.) कम्पनी शासन का अन्त-

भारत सरकार अधिनियम 1858-

·        इस कानून का निर्माण 1857 के विद्रोह के पश्चात् किया गया, जिसे भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम या सिपाही विद्रोह भी कहा जाता है।

·        1857 की राज्य क्रान्ति में, जिसमें कम्पनी के शासन को एक तरह से समाप्त कर दिया। इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री ‘पार्मस्टन’ ने कम्पनी का शासन समाप्त करने के लिए विधेयक प्रस्तुत किया, जो पारित न हो सका, किन्तु आने वाली सरकार ने उन्ही नीतियों का अनुसरण कर दूसरा विधेयक संसद में पेश किया, जो 1858 में “एक्ट फॉर द बेटल गवर्न्मेन्ट ऑफ इण्डिया” नाम से पारित किया गया।

भारतीय परिषद् अधिनियम 1861-

·        1861 का एक्ट भारत के संवैधानिक विकास में दो कारणों से संवैधानिक महत्व रखता है।

I.सर्वप्रथम इस अधिनियम ने विधि बनाने के कार्य में भारतीयों के सहयोग का प्रावधान किया

II. प्रान्तीय विधानसभाओं को विधि बनाने का अधिकार भी दिया गया।

·        भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने की शुराआत हुई। 1862ई. में केनिंग ने तीन भारतीयों बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा और दिनकर राव को विधानपरिषद् में मनोनीत किया। इसी बीच 1885ई. में एलन आक्टेवियन ह्यूम द्वारा अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की गई।

भारतीय परिषद् अधिनियम 1909 ( मार्ले-मिण्टो सुधार)- 

·        नवम्बर 1906ई. में कर्जन के स्थान पर मिण्टो को भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया और जॉन मार्ले को भारत का राज्य सचिव बनाया गया।

·        इस एक्ट के अन्तर्गत पहली बार किसी भारतीय को वायसराय की कार्यपरिषद् के साथ एसोसिएशन बनाने का प्रावधान किया गया।

·        सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा वायसराय की कार्यपालिका परिषद् के प्रथम भारतीय सदस्य थे। उन्हें विधि सदस्य बनाया गया था।

·        इस अधिनियम में पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया। जिसके अन्तर्गत मुस्लिम सदस्यों का चुनाव मुस्लिम मतदाता ही कर सकते थे। इस प्रकार इस अधिनियम को “साम्प्रदायिक निर्वाचन के जनक” के रुप में जाना गया।

·        स्त्रियों मताधिकार प्राप्त नही थे। इस एक्ट ने प्रेसीडेन्सी कार्पोरेशन चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स युनिवर्सिटी और जमींदारों के लिए अलग प्रतिनिधित्व का प्रावधान भी किया।

भारत शासन अधिनियम 1919 ( माण्टेंग्यू चेम्सफोर्ड सुधार )- 

·        इस एक्ट ने प्रान्तों में एक उत्तरदायी सरकार की स्थापना तो अवश्य की, लेकिन इस सिद्धान्तों को केन्द्रीय सरकार में लागू नही किया।

·         क्रमिक रुप से 1919ई. में भारत शासन अधिनियम बनाया गया, जो 1921ई. में लागू हुआ। माण्टेंग्यु भारत के राज्य सचिव और चेम्सफोर्ड वायसराय के पद पर थे।

·        इस एक्ट में प्रान्तीय विषयों को पुनः दो भागों में बाँट दिया गया-

I हस्तान्तरित

II रक्षित/आरक्षित

 हस्तान्तरित विषयों पर गवर्नर, मन्त्रियों की सहायता से कार्य करता था, जो विधानपरिषद् के प्रति उत्तरदायी थे तथा रक्षित विषयों पर गवर्नर कार्यपालिका परिषद् की सहायता से शासन करता था, जो विधानपरिषद् के प्रति उत्तरदायी नही थी। शासन की इस व्यवस्था को “द्वैधशासन व्यवस्था” कहा गया। “द्वैध शब्द यूनानी शब्द डाई आर्की से व्युत्पन्न है।“

·        इस एक्ट में पहली बार द्विसदनीय व्यवस्था और प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था की गई।

·        इस एक्ट ने सम्पत्ति कर या शिक्षा के आधार पर सीमित संख्या में लोगों को मताधिकार प्रदान किया।

·        इसमें एक लोकसेवा आयोग का गठन किया गया। अतः 1926 में सिविल सेवकों की भर्ती हेतु केन्द्रीय लोक सेवा आयोग का गठन किया गया।

·        इसने पहली बार केन्द्रीय बजट को राज्यों के बजट से अलग कर दिया और राज्य विधानसभाओं को अपना बजट स्वयं बनाने के लिए अधिकृत कर दिया।

साइमन कमीशन(1927-28)- इस आयोग में कोई भी भारतीय नही था। भारत के सभी राजनीतिक दलों ने इसका बहिष्कार किया। इसमें कुल सात सदस्य थे, जो ‘साइमन’ के नेतृत्व में था। इसे श्वेत आयोग भी कहा जाता है।

कम्यूनल अवार्ड (साम्प्रदायिक पंचाट)-  ब्रिटिश प्रधानमन्त्री मैकडोनाल्ड ने अगस्त 1932ई. में अल्प संख्यकों के प्रतिनिधित्व पर एक योजना की घोषणा की, जिसे साम्प्रदायिक पंचाट के नाम से जाना जाता है। इसने न सिर्फ मुस्लिमों, सिक्खों, इसाईयों, यूरोपीयों और आंग्ल भारतीयों हेतु अलग निर्वाचन व्यवस्था का विस्तार किया, बल्कि दलितों के लिए इसका विस्तार किया।

भारत शासन अधिनियम (1935)-

1935 का एक्ट भारत में उत्तरदायित्वपूर्ण शासन की स्थापना के मार्ग में 1919 के भारत सरकार अधिनियम के बाद दूसरा महत्वपूर्ण कदम था। यह एक बहुत लम्बा व जटिल अधिनियम था। इसमें 14 भाग, 10 अनुसूची और 321 अनुच्छेद थे। भारत का वर्तमान संवैधानिक ढ़ाँचा बहुत कुछ 1935 के एक्ट पर आधारित है, इस अधिनियम की निम्नलिखित विशेषताएँ है-

·        इसमें अखिल भारतीय संघ की स्थापना की गई, जिसमें राज्य व रियासतों को एक इकाई के रुप में माना गया। अधिनियम ने केन्द्र व इकाईयों के बीच संघ सूची (59), राज्य सूची (54) और समवर्ती सूची (36) के आधार पर शक्तियों का बँटवारा किया गया। अवशिष्ट शक्तियाँ वायसराय को दी गई, हालांकि यह संघीय व्यवस्था कभी अस्तित्व में नही आयी, क्योंकि देशी रियासतों ने इसमें शामिल होने से मना कर दिया था।

·        इसने प्रान्तों मे द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त कर दी तथा प्रान्तीय स्वायत्तता का शुभारमभ किया। राज्यों में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की यानि गवर्नर को राज्य विधानपरिषदों के लिए उतरदायी मन्त्रियों की सलाह पर काम करना आवश्यक हो गया। यह व्यवस्था 1937 में शुरु की गई और 1939 में इस समाप्त कर दिया गया।

·        इस एक्ट के तहत केन्द्रों में द्वैध शासन प्रणाली लागू हुआ।

·        इसमें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्थापना 1935 ई. में की गई।

·        संघीय लोक सेवा आयोग व प्रान्तीय लोक सेवा आयोग और साथ ही साथ संयुक्त लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई।

·        संयुक्त लोक सेवा आयोग- दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक लोक सेवा आयोग।

·        संघीय  न्यायालय की स्थापना की गई।

·        इस एक्ट द्वारा कुछ प्रान्तों में द्विसदनीय विधानमण्डल की स्थापना की गई । उच्च सदन को विधानपरिषद् तथा निम्न सदन को विधानसभा कहा गया। इस प्रकार बंगाल, बम्बई और मद्रास, बिहार, संयुक्त प्रान्त व असम में द्विसदनीय व्यवस्था की गई।

·        फेडरल (संघीय) कोर्ट को तीन प्रकार की अधिकारिता प्राप्त थी-

1.प्रारम्भिक अधिकारिता

2.अपीलीय अधिकारिता

3.परामर्शदात्रीय अधिकारिता