ऐतिहासिक
पृष्ठभूमि
भारतीय संविधान
के ऐतिहासिक विकास का काल सन् 1600ई. से प्रारम्भ होता है। इसी वर्ष इंग्लैण्ड में
ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की गई थी। संविधान के विकास काल को हम पाँच भागों
में बाँट सकते है-
1.
1600ई.
– 1765ई.
2.
1765ई.
– 1858ई.
3.
1858ई.
– 1919ई.
4.
1919ई.
– 1947ई.
5.
1947ई.
– 1949ई.
1. (1600ई.
– 1765ई.) अंग्रेजों का भारत आगमन-
ईस्ट इण्डिया
कम्पनी की स्थापना 1600ई. में इंग्लैण्ड की महारानी एलिजावेथ के शासनकाल में हुआ
था। इस काल को इंग्लैण्ड के इतिहास में स्वर्ण काल कहा जाता है। इस कम्पनी की
स्थापना महारानी के राजलेख द्वारा की गई। भारत में कम्पनी का पहला व्यापारिक
केन्द्र सूरत था।
1726 का राजलेख-
·
इस
राजलेख द्वारा कलकत्ता, बम्बई और मद्रास प्रेसीडेन्सी के राज्यपाल एवं उसकी परिषद्
को विधि बनाने की शक्ति प्रदान की गई।
·
1757ई. में अंग्रेज प्लासी की लड़ाई में बंगाल
नवाब सिराजुद्दौला को हराकर बंगाल प्रान्त में वास्तविक शासक बन बैठे। प्लासी की
जीत से ही भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव पड़ी।
2.
(1765ई. – 1858ई.) ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना-
1773 का रेग्यूलेटिंग
एक्ट-
·
इस
एक्ट द्वारा बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल बना दिया गया एवं उसकी
सहायता हेतु चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद् का गठन किया गया।
·
बंगाल
का प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स बना। इस एक्ट द्वारा मद्रास एवं बम्बई के
गवर्नर, बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन हो गए।
·
इस
एक्ट के अन्तर्गत कलकत्ता में 1774ई. में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई।
जिसमें एक मुख्य जज (एलिजाह इम्पे) एवं तीन अन्य जज (चैम्बर्स, लिमेस्टर एवं हाइड)
थे तथा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध अपील प्रिवी काउंसिल में की जाती थी।
1781 का एक्ट ऑफ
सेटलमेन्ट-
·
इस
एक्ट को रेग्यूलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने हेतु पारित किया था। इस एक्ट ने
कलकत्ता की सरकार को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के लिए विधि बनाने का प्राधिकार किया।
1784 का पिट्स
इण्डिया एक्ट-
·
इस
एक्ट में कम्पनी के राजनैतिक एवं वाणिज्यिक कार्यों को पृथक-पृथक कर दिया। इसने
निदेशक मण्डल को कम्पनी के व्यापारिक मामलों के अधीक्षण की अनुमति तो दे दी,
परन्तु राजनैतिक मामलों के प्रबन्धन हेतु “नियन्त्रण बोर्ड” नाम से एक नये निकाय
का गठन किया। इस प्रकार द्वैध शासन व्यवस्था शुरु हुई।
·
यह
एक्ट दो कारणों से महत्वपूर्ण था। पहला कि भारत में कम्पनी के अधीन क्षेत्र को
पहली बार ब्रिटिश अधिपत्य का क्षेत्र कहा गया। दूसरा कि ब्रिटिश सरकार को भारत में
कम्पनी कार्यों और प्रशासन पर पूर्ण नियन्त्रण प्रदान किया गया हो।
1793 का चार्टर
एक्ट-
·
इस
चार्टर एक्ट ने कम्पनी व्यापार की अवधि को 20वर्षों के लिए बढ़ा दिया।
1813 का चार्टर
एक्ट-
·
इसके
द्वारा कम्पनी का भारत में व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया तथा सभी ब्रिटिश
निवासियों को भारत में व्यापारिक छूट दे दी गई तथा कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास की
सरकारों द्वारा बनाई गी विधियों का ब्रिटिश संसद द्वारा अनुमोदन किया जाना
अनिवार्य कर दिया गया।
1833 का चार्टर
एक्ट-
·
इसमें
बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया। जिसमें सभी नागरिक व सैन्य
शक्तियाँ निहित थी।
·
इसके
अन्तर्गत पहली बार सिविल सर्विस के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता के आयोजन का
प्रयास किया गया। हालांकि बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर के विरोध के कारण इस प्रावधान को
समाप्त कर दिया गया।
1853 का चार्टर
एक्ट-
·
सर्वप्रथम
सम्पूर्ण भारत के लिए एक विधानमण्डल की स्थापना की गई, जिसमें सिविल सेवकों की
भर्ती एवं चयन हेतु खुली प्रतियोगिता का शुभारम्भ किया गया। इस प्रकार विशिष्ट
सिविल सेवा भारतीय नागरिक के लिए भी खोल दी गई और इसके लिए 1854ई. में मैकाले
समिति का गठन किया गया।
·
इसने
भारतीय शासन को सम्राट को हस्तान्तरित करने का मार्ग प्रशस्त किया। 1857 के विद्रोह
ने इस प्रक्रिया को और भी तीव्र गति प्रदान की और ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन
समाप्त कर दिया।
3.
(1858ई.- 1919ई.) कम्पनी शासन का अन्त-
भारत सरकार
अधिनियम 1858-
·
इस
कानून का निर्माण 1857 के विद्रोह के पश्चात् किया गया, जिसे भारत का प्रथम
स्वतन्त्रता संग्राम या सिपाही विद्रोह भी कहा जाता है।
·
1857
की राज्य क्रान्ति में, जिसमें कम्पनी के शासन को एक तरह से समाप्त कर दिया।
इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री ‘पार्मस्टन’ ने कम्पनी का शासन समाप्त करने के लिए
विधेयक प्रस्तुत किया, जो पारित न हो सका, किन्तु आने वाली सरकार ने उन्ही नीतियों
का अनुसरण कर दूसरा विधेयक संसद में पेश किया, जो 1858 में “एक्ट फॉर द बेटल
गवर्न्मेन्ट ऑफ इण्डिया” नाम से पारित किया गया।
भारतीय परिषद्
अधिनियम 1861-
·
1861
का एक्ट भारत के संवैधानिक विकास में दो कारणों से संवैधानिक महत्व रखता है।
I.सर्वप्रथम
इस अधिनियम ने विधि बनाने के कार्य में भारतीयों के सहयोग का प्रावधान किया
II.
प्रान्तीय विधानसभाओं को विधि बनाने का अधिकार भी दिया गया।
·
भारतीय
प्रतिनिधियों को शामिल करने की शुराआत हुई। 1862ई. में केनिंग ने तीन भारतीयों
बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा और दिनकर राव को विधानपरिषद् में मनोनीत किया।
इसी बीच 1885ई. में एलन आक्टेवियन ह्यूम द्वारा अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की
स्थापना की गई।
भारतीय परिषद्
अधिनियम 1909 ( मार्ले-मिण्टो सुधार)-
·
नवम्बर
1906ई. में कर्जन के स्थान पर मिण्टो को भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया और जॉन
मार्ले को भारत का राज्य सचिव बनाया गया।
·
इस
एक्ट के अन्तर्गत पहली बार किसी भारतीय को वायसराय की कार्यपरिषद् के साथ एसोसिएशन
बनाने का प्रावधान किया गया।
·
सत्येन्द्र
प्रसाद सिन्हा वायसराय की कार्यपालिका परिषद् के प्रथम भारतीय सदस्य थे। उन्हें
विधि सदस्य बनाया गया था।
·
इस
अधिनियम में पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व
का प्रावधान किया गया। जिसके अन्तर्गत मुस्लिम सदस्यों का चुनाव मुस्लिम मतदाता ही
कर सकते थे। इस प्रकार इस अधिनियम को “साम्प्रदायिक निर्वाचन के जनक” के रुप में
जाना गया।
·
स्त्रियों
मताधिकार प्राप्त नही थे। इस एक्ट ने प्रेसीडेन्सी कार्पोरेशन चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स
युनिवर्सिटी और जमींदारों के लिए अलग प्रतिनिधित्व का प्रावधान भी किया।
भारत शासन अधिनियम 1919 ( माण्टेंग्यू चेम्सफोर्ड सुधार
)-
·
इस
एक्ट ने प्रान्तों में एक उत्तरदायी सरकार की स्थापना तो अवश्य की, लेकिन इस
सिद्धान्तों को केन्द्रीय सरकार में लागू नही किया।
·
क्रमिक रुप से 1919ई. में भारत शासन अधिनियम
बनाया गया, जो 1921ई. में लागू हुआ। माण्टेंग्यु भारत के राज्य सचिव और चेम्सफोर्ड
वायसराय के पद पर थे।
·
इस
एक्ट में प्रान्तीय विषयों को पुनः दो भागों में बाँट दिया गया-
I हस्तान्तरित
II रक्षित/आरक्षित
हस्तान्तरित विषयों पर गवर्नर, मन्त्रियों की सहायता से
कार्य करता था, जो विधानपरिषद् के प्रति उत्तरदायी थे तथा रक्षित विषयों पर गवर्नर
कार्यपालिका परिषद् की सहायता से शासन करता था, जो विधानपरिषद् के प्रति उत्तरदायी
नही थी। शासन की इस व्यवस्था को “द्वैधशासन व्यवस्था” कहा गया। “द्वैध शब्द यूनानी शब्द डाई आर्की से व्युत्पन्न है।“
·
इस
एक्ट में पहली बार द्विसदनीय व्यवस्था और प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था की गई।
·
इस
एक्ट ने सम्पत्ति कर या शिक्षा के आधार पर सीमित संख्या में लोगों को मताधिकार
प्रदान किया।
·
इसमें
एक लोकसेवा आयोग का गठन किया गया। अतः 1926 में सिविल सेवकों की भर्ती हेतु
केन्द्रीय लोक सेवा आयोग का गठन किया गया।
·
इसने
पहली बार केन्द्रीय बजट को राज्यों के बजट से अलग कर दिया और राज्य विधानसभाओं को
अपना बजट स्वयं बनाने के लिए अधिकृत कर दिया।
साइमन कमीशन(1927-28)- इस आयोग में कोई भी भारतीय नही था। भारत के सभी राजनीतिक
दलों ने इसका बहिष्कार किया। इसमें कुल सात सदस्य थे, जो ‘साइमन’ के नेतृत्व में
था। इसे श्वेत आयोग भी कहा जाता है।
कम्यूनल अवार्ड (साम्प्रदायिक पंचाट)- ब्रिटिश
प्रधानमन्त्री मैकडोनाल्ड ने अगस्त 1932ई. में अल्प संख्यकों के प्रतिनिधित्व पर
एक योजना की घोषणा की, जिसे साम्प्रदायिक पंचाट के नाम से जाना जाता है। इसने न
सिर्फ मुस्लिमों, सिक्खों, इसाईयों, यूरोपीयों और आंग्ल भारतीयों हेतु अलग
निर्वाचन व्यवस्था का विस्तार किया, बल्कि दलितों के लिए इसका विस्तार किया।
भारत शासन अधिनियम (1935)-
1935 का एक्ट भारत में उत्तरदायित्वपूर्ण शासन की
स्थापना के मार्ग में 1919 के भारत सरकार अधिनियम के बाद दूसरा महत्वपूर्ण कदम था।
यह एक बहुत लम्बा व जटिल अधिनियम था। इसमें 14 भाग, 10 अनुसूची और 321 अनुच्छेद
थे। भारत का वर्तमान संवैधानिक ढ़ाँचा बहुत कुछ 1935 के एक्ट पर आधारित है, इस
अधिनियम की निम्नलिखित विशेषताएँ है-
·
इसमें
अखिल भारतीय संघ की स्थापना की गई, जिसमें राज्य व रियासतों को एक इकाई के रुप में
माना गया। अधिनियम ने केन्द्र व इकाईयों के बीच संघ सूची (59), राज्य सूची (54) और
समवर्ती सूची (36) के आधार पर शक्तियों का बँटवारा किया गया। अवशिष्ट शक्तियाँ
वायसराय को दी गई, हालांकि यह संघीय व्यवस्था कभी अस्तित्व में नही आयी, क्योंकि
देशी रियासतों ने इसमें शामिल होने से मना कर दिया था।
·
इसने
प्रान्तों मे द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त कर दी तथा प्रान्तीय स्वायत्तता का
शुभारमभ किया। राज्यों में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की यानि गवर्नर को राज्य
विधानपरिषदों के लिए उतरदायी मन्त्रियों की सलाह पर काम करना आवश्यक हो गया। यह
व्यवस्था 1937 में शुरु की गई और 1939 में इस समाप्त कर दिया गया।
·
इस
एक्ट के तहत केन्द्रों में द्वैध शासन प्रणाली लागू हुआ।
·
इसमें
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI)
की स्थापना 1935
ई. में की गई।
·
संघीय
लोक सेवा आयोग व प्रान्तीय लोक सेवा आयोग और साथ ही साथ संयुक्त लोक सेवा आयोग की
स्थापना की गई।
·
संयुक्त
लोक सेवा आयोग- दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक लोक सेवा आयोग।
·
संघीय न्यायालय की स्थापना की गई।
·
इस
एक्ट द्वारा कुछ प्रान्तों में द्विसदनीय विधानमण्डल की स्थापना की गई । उच्च सदन
को विधानपरिषद् तथा निम्न सदन को विधानसभा कहा गया। इस प्रकार बंगाल, बम्बई और
मद्रास, बिहार, संयुक्त प्रान्त व असम में द्विसदनीय व्यवस्था की गई।
·
फेडरल
(संघीय) कोर्ट को तीन प्रकार की अधिकारिता प्राप्त थी-
1.प्रारम्भिक
अधिकारिता
2.अपीलीय
अधिकारिता
3.परामर्शदात्रीय
अधिकारिता










