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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

संविधान के महत्वपूर्ण संशोधन

भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संशोधन

 21वाँ संविधान संशोधन, 1967-

-        सिंधी भाषा आठवीं अनुसूची में 15वीं भाषा के रूप में शामिल।

24वाँ संविधान संशोधन, 1971

1.     संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह संविधान के किसी भी हिस्से में चाहे वह मूल अधिकार हो, संशोधन कर सकती है।

2.     राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक संशोधन विधेयक को मंजूरी दिया जाना जरूरी कर दिया गया।

 36वाँ संविधान संशोधन, 1975-

-        सिक्किम को भारतीय संघ का पूर्ण राज्य बनाकर दसवीं अनुसूची को समाप्त कर दिया गया।

37वाँ संविधान संशोधन, 1975-

-        केन्द्रशासित राज्य अरुणाचल प्रदेश के लिए विधानसभा और मंत्रिपरिषद् की व्यवस्था।

 42वाँ संविधान संशोधन, 1976-

1.तीन नए शब्द जोड़े गए- समाजवादी, पंथ निरपेक्ष एवं अखण्डता।

2. नागरिकों द्वारा मूल कर्त्तव्यों को जोड़ गया(भाग-4क)

3.राष्ट्रपति को कैबिनेट की सलाह के लिए बाध्यता।

4.प्रशासनिक अधिकरणों एवं अन्य मामलों पर अधिकरणों की व्यवस्था(भाग-14क)

5.1971 की जनगणना के आधार पर 2001 तक लोकसभा सीटों एवं राज्य विधानसभा सीटों को निश्चित किया गया।

6.सांविधानिक संशोधन को न्यायिक जाँच से बाहर किया गया।

7.न्यायिक समीक्षा एवं रिट न्यायक्षेत्र में उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों की शक्ति में कटौती।

8.लोकसभा एवं विधानसभा के कार्यकाल में 5 से 6 वर्ष की बढ़ोतरी।

9.निदेशक तत्वों के कार्यान्वयन हेतु बनाई गई विधियों को न्यायालय द्वारा इस आधार पर अवैध घोषित नहीं किया जा सकता कि ये कुछ मूल अधिकारों का उल्लंघन हैं।

10.संसद को राष्ट्र विरोधी कार्यकलापों के सम्बन्ध में कार्यवाही करने के लिए विधियां बनाने की शक्ति प्रदान की गयी और ऐसी विधियां मूल अधिकारों पर अभिभावी होंगी।

11.तीन नए निदेश तत्व जोड़ें गए अर्थात समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता, उद्योगों के प्रबन्ध में कर्मकारों का भाग लेना, पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा।

12.भारत के किसी एक भाग में राष्ट्रीय आपदा की घोषणा।

13.राज्य में राष्ट्रपति शासन के कार्यकाल में एक बार में छः माह से एक साल तक की बढ़ोतरी।

14.केन्द्र को किसी राज्य में कानून एवं व्यवस्ता बनाए रखने के लिए सैन्य बल भेजने की शक्ति।

15.पाँच विषयों का राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानान्तरण, जैसे- शिक्षा, वन, वन्य जीवों एवं पक्षियों का संरक्षण, नाप-तौल और न्याय प्रशासन एवं उच्चतम और उच्च न्यायालय के अलावा सभी न्यायालयों का गठन और संगठन।

16.संसद और विधानमण्डल में कोरम की आवश्यकता की समाप्ति।

17.संसद को यह निर्णय लेने में शक्ति प्रदान की  कि समय-समय पर अपने सदस्यों एवं समितियों के अधिकार एवं विशेषाधिकारों का निर्धारण करे।

18.अखिल भारतीय विधिक सेवा के निर्माण की व्यवस्था।

19.सिविल सेवक को दूसरे चरण पर जाँच के उपरान्त प्रतिवेदन के अधिकार को समाप्त कर अनुशासनात्मक कार्यवाही को छोटा किया गया(प्रस्तावित दण्ड के मामलें में)

 44वाँ संविधान संशोधन, 1978-

1.लोकसभा एवं राज्य विधानमण्डल के कार्यकाल को पूर्ववत् रखा गया(5 वर्ष)

2.संसद एवं राज्य विधानमण्डल में कोरम के उपबन्ध को पूर्ववत रखा गया।

3.संसदीय विशेषाधिकारों के सम्बन्ध में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के सन्दर्भ को हटा दिया।

4.संसद एवं राज्य विधानमण्डल की कार्यवाही की कार्यवाही की रिपोर्ट के समाचार पत्र में प्रकाशन के लिए सांविधानिक संरक्षण प्रदान किया गया।

5.कैबिनेट की सलाह को पुनर्विचार के लिए एक बार भेजने की राष्ट्रपति की शक्ति, परन्तु पुनर्विचार के पश्चात् पुनः भेजने पर अनुमति देना बाध्यकारी कर दिया गया।

6.अध्यादेश जारी करने में राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं प्रशासक की संतुष्टि के उपबंध को समाप्त किया गया।

7.उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय की कुछ शक्तियों को फिर से प्रदान किया गया।

8.राष्ट्रीय आपात के सन्दर्भ में ‘आन्तरिक अशान्ति’ शब्द के स्थान पर ‘संशस्त्र विद्रोह’ शब्द रखा गया।

9.राष्ट्रपति के लिए यह व्यवस्था बनाई गई कि वह केवल कैबिनेट की लिखित सिफारिश पर ही आपातकाल घोषित कर सकता है।

10.राष्ट्रीय आपात और राष्ट्रपति शासन के मुद्दे पर सुरक्षा की दृष्टि से कुछ और व्यवस्थाएँ बनाई गई।

11.मूल अधिकारों की सूची से सम्पत्ति का अधिकार समाप्त किया गया और इसे केवल विधिक अधिकार बनाया गया।

12.अनुच्छेद-20 और 21 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल में निलंबित नहीं किया जा सकता।

13.उस उपबन्ध को हटाया गया, जिसने न्यायालय के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और लोकसभा अध्यक्ष के निर्वाचन सम्बन्धी विवाद मामलों पर निर्णय देने की शक्ति छीन ली थी।

 52वाँ संविधान संशोधन, 1985-

-        इसके तहत संसद एवं राज्य विधानमण्डल के सदस्यों को दल-बदल के मामलें में निरर्हक ठहराने की व्यवस्था है इसके विस्तार से दसवां अनुसूची को जोड़ा गया है।

61वाँ संविधान संशोधन, 1989-

-     लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में मतदान की उम्र 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।

 69वाँ संविधान संशोधन, 1991-

-     केन्द्रशासित राज्य दिल्ली को विशेष दर्जा देते हुए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली बनाया गया। इस संशोधन में दिल्ली के लिए 70 सदस्यीय विधानसभा एवं 7 सदस्यीय मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था भी की गई।

70वाँ संविधान संशोधन, 1992-

-     राष्ट्रपति के निर्वाचन में निर्वाचन कॉलेज के रूप में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली विधानसभा के सदस्यों एवं केन्द्रशासित राज्य पुडुचेरी को भी शामिल किया गया।

 73वाँ संविधान संशोधन, 1992-

-        पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक स्थिति एवं सुरक्षा प्रदान की गई। इस उद्देश्य के लिए संशोधन में नया भाग-9 जोड़ा गया। जिसे ‘पंचायत’ नाम दिया गया और नई 11वीं अनुसूची में पंचायत की 29 कार्यात्मक मदें जोड़ी गई।

 74वाँ संविधान संशोधन, 1992-

-        शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक स्थिति एवं सुरक्षा प्रदान की गई। इस उद्देश्य के लिए संशोधन ने नया भाग-9(क) जोड़ा जिसे ‘नगरपालिकाएँ’ नाम दिया गया और नई 12वीं अनुसूची में नगरपालिकाओं की 18 कार्यात्मक मदें जोड़ी गई।

 86वाँ संविधान संशोधन, 2002-

1.     प्रारम्भिक शिक्षा को मूल अधिकार बनाया गया। नए अनुच्चेद-21(क) में घोषणा की गई कि ‘राज्यों को 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए।‘

2.     निदेशक तत्वों के मामले में अनुच्छेद-45 की विषय-वस्तु बदली गई, राज्य सभी बालकों को चौदह वर्ष की आयु पूरी होने तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए उपबन्ध करने का प्रयास करेगा।

3.     अनुसूची-51(क) के तहत् एक नया मूल कर्त्तव्य जोड़ा गया जिसे पढ़ा गया, “यह हर भारतीय नागरिक का कर्त्तव्य होगा कि वह अपने बच्चे को चाहे वह उसके मात-पिता हो या अभिभावक छः और चौदह वर्ष की उम्र तक शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराए।“

 97वाँ संविधान संशोधन, 2011-

-        इस संशोधन के द्वारा सहकारी समितियों को एक संवैधानिक स्थान एवं संरक्षण प्रदान किया गया। संशोधन द्वारा संविधान में निम्नलिखित तीन बदलाव किये गये-

1.     सहकारी समिति बनाने का अधिकार एक मौलिक अधिकार बन गया। [अनुच्छेद-19]

2.     राज्य की नीति में सहकारी समितियों को बढ़ावा देने का एक नया नीति निदेशक सिद्धान्त का समावेश। [अनुच्छेद-43()]

3.     “सहकारी समितियां” नाम से एक नया भाग-9(ख) संविधान में जोड़ा गया। [अनुच्छेद-243यज से 243यन]

99वाँ संविधान संशोधन, 2014-

-        सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली के स्थान पर एक नये निकाय “राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग” की स्थापना की गई। हालांकि वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस संशोधन को असंवैधानिक एवं रद्द घोषित कर दिया। परिणामस्वरूप पूर्व में चल रही कॉलेजियम प्रणाली पुनः लागू की गई [संशोधित अनुच्छेद- 124, 127, 128, 217, 222, 224, 224(क), 231 तथा सन्निविष्ट अनुच्छेद- 124(क), 124(ख), 124(ग)]

100वाँ संविधान सशोधन, 2015-

-        भारत द्वारा कतिपय भू-भाग का अधिग्रहण एवं कुछ अन्य भू-भाग का बांग्लादेश को हस्तांतरण, भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौता 1974 तथा इसके प्रोटोकॉल 2011 के अनुपालन में। इस उद्देश्य के लिए इस संशोधित अधिनियम ने चार राज्यों (असम, पश्चिम बंगाल, मेघालय एवं त्रिपुरा) के भू-भागों को सम्बन्धित संविधान की पहली अनुसूची के प्रावधानों को संशोधित किया।

 101वाँ संविधान संशोधन, 2016-

-        इस संशोधन ने देश में वस्तु और सेवा कर शासन की शुरुआत मार्ग को प्रशस्त  किया। जो केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा लगाये जा रहे अप्रत्यक्ष करों का स्थान लेगा। इस संशोधन में निम्नलिखित प्रावधान किये गये-

1.     वस्तुओं और सेवाओं या दोनों की आपूर्ति के प्रत्येक लेनदेन पर वस्तु और सेवा कर लगाने के लिए कानून बनाने के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं को समवर्ती कर लगाने की शक्तियाँ प्रदान की गई।

2.     इसने संविधान के तहत ‘विशेष महत्व के घोषित समान’ की अवधारणा को खारिज कर दिया।

3.     वस्तुओं और सेवाओं के अन्तर्राज्यीय लेनदेन पर एकीकृत वस्तु और सेवा कर के लगाने के लिए प्रदान किया गया।

4.     राष्ट्रपति के आदेश से एक वस्तु और सेवा कर परिषद् की स्थापना।

5.     पाँच साल की अवधि हेतु वस्तु और सेवा कर की शुरुआत के कारण राजस्व के नुकसान के लिए राज्यों को मुआवजे का प्रावधान किया।

6.     सातवीं अनुसूची की संघ और राज्य सूची में कुछ प्रविष्टियों को प्रतिस्थापित और लोप किया गया।

102वाँ संविधान संशोधन, 2018-

1.     राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया जो 1993 में संसद के एक अधिनियम द्वारा स्थापित किया गया था।

2.     पिछड़े वर्गों के सम्बन्ध में अपने कार्यों से राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को राहत दी।

3.     राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को निर्दिष्ट करने के लिए राष्ट्रपति को अधिकार दिया।

 103वाँ संविधान संशोधन, 2019-

1.     नागरिकों के किसी भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की उन्नति के लिए कोई विशेष प्रावधान करने के लिए राज्य को सशक्त बनाना।

2.     राज्य को निजी शिक्षण संस्थानों सहित शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए इस तरह के वर्गों के लिए 10% सीटों तक के आरक्षण का प्रावधान करने की अनुमति दी गई है, चाहे वह सहायता प्राप्त हो या राज्य द्वारा सहायता प्राप्त न हो, अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की अपेक्षा करता है। 10% तक का यह आरक्षण के अतिरिक्त होगा।

3.     राज्य को ऐसे वर्गों के पक्ष में 10% नियुक्तियों या पदों के आरक्षण का प्रावधान करने की अनुमति दी। 10% तक का मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त होगा। 

 104वाँ संविधान संशोधन, -

-        यह अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण से सम्बन्धित प्रावधानों में संशोधन करता है। इसके अनुसार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और जनजातियों के आरक्षण को 25 जनवरी, 2030 तक 10 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।


रविवार, 22 नवंबर 2020

Citizenship

 

नागरिकता(Citizenship)

किसी भी राज्य की जनसंख्या को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है- पहला नागरिक, दूसरा अन्य देशी। नागरिक को सिविल अधिकार प्राप्त है, परन्तु विदेशियों को यह अधिकार नही मिलते है। संविधान में नागरिकता की कोई परिभाषा नही दी गई है। भारत में ब्रिटेन के समान एकल नागरिकता की कोई परिभाषा नही दी गई है, जबकि अमेरिका में दोहरी नागरिकता।

नोट- हमारा संविधान परिसंघीय है, फिर भी इसमें केवल एक ही नागरिकता की व्यवस्था है अर्थात भारत की नागरिकता। जबकि अमेरिका परिसंघीय राज्य है और वहाँ दोहरी नागरिकता है अर्थात परिसंघ की या राष्ट्रीय नागरिकता और उस राज्य की नागरिकता जहाँ उस व्यक्ति का जन्म हुआ है, जहाँ वह स्थायी रुप से निवास करता है।

संविधान नागरिकता से सम्बन्धित पूरी विधि नही प्रस्तुत करता है। संविधान का भाग-2 केवल उन वर्गों के लोगों के बारे में उल्लेख करता है, जो संविधान के लागू होने का समय अर्थात 26 जनवरी 1950 को भारतीय नागरिक माने गये थे और नागरिकता से सम्बन्धित शेष बातों के लिए विधि बनाने की शक्ति संसद को प्रदान करता है तथा अनुच्छेद-2 संसद को इस विषय पर विधि बनाने की शक्ति प्रदान करता है, जिसके तहत् संसद द्वारा भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 में यह भी अभिकथित है, कि- संविधान के उपबन्धों के अधीन किस प्रकार किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता समाप्त हो जाये, चाहे वह नागरिकता अधिनियम 1955 के अधीन अर्जित की गई हो या उसके पूर्व ( अनुच्छेद-(5-8) ) के अधीन। यह तीन प्रकार की हो सकती है-

 1. त्यागने पर (स्वेच्छा से छोड़ने पर)

 2. पर्यवासन पर ( स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता लेने पर)

 3. वंचित किये जाने पर ( जबरदस्ती निकाल दिये जाने पर)

संविधान के प्रारम्भ पर नागरिकता- संविधान के निम्न व्यक्ति भारत के नागरिक होंगे-

·        अधिवास द्वारा।

·        पाकिस्तान से प्रवर्जन करके आये हुए व्यक्तियों की नागरिकता।

·        भारत से पाकिस्तान प्रवर्जन करने वाले व्यक्तियों की नागरिकता।

·        विदेशों में रहने वाले व्यक्तियों की नागरिकता।

अनुच्छेद-9:वह व्यक्ति भारत का नागरिक नही होगा या भारत का नागरिक नही माना जायेगा, जो स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता स्वीकार कर लेगा।

अनुच्छेद-10: संसद द्वारा नागरिकता के अधिकारों का विनियमन।

अनुच्छेद-10 यह उपबन्धित करता है, कि व्यक्ति पूर्ववर्ती उपबन्धों के अनुसार भारत का नागरिक है या समझा जाता है। वह भारत का नागरिक बना रहेगा, किन्तु उसका यह अधिकार संसद द्वारा बनायी गई विधि के अधीन होगा। नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार भारतीय नागरिकता पाँच प्रकार से प्राप्त की जा सकती है-

1. जन्म से- प्रत्येक व्यक्ति, जिसका जन्म संविधान लागू होने अर्थात 26 जनवरी 1950 को या उसके बाद भारत में हुआ हो, वह जन्म से भारत का नागरिक होगा, यदि कोई व्यक्ति भारत के राज्य क्षेत्र में अधिवासी है और जो भारत के राज्य क्षेत्र में जन्मा है, चाहे उसके माता-पिता की राष्ट्रीयता कुछ भी हो, वह भारत का नागरिक होगा।

2. वंशक्रम द्वारा नागरिकता- कोई ऐसा व्यक्ति, जो 26 जनवरी 1950 को या उसके बाद भारत के बाहर पैदा हुआ हो। वंशक्रम के अनुसार भारत का नागरिक होगा, यदि उसके जन्म के समय उसके माता या पिता में से कोई भी भारत का नागरिक हो।

नोट:- माता की नागरिकता के आधार पर विदेश में जन्में व्यक्ति को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान नागरिकता संशोधन अधिनियम 1922 में किया गया

3. पंजीकरण द्वारा नागरिकता- निम्न व्यक्तियों में से कोई व्यक्ति पंजीकरण द्वारा भारतीय नागरिकता ग्रहण कर सकता है-

·        ऐसा व्यक्ति, जिसका जन्म भारत में हुआ हो, किन्तु भारत से बाहर किसी अन्य देश में निवास कर रहा हो।

·        ऐसी विदेशी महिला, जो किसी भारतीय से विवाह कर चुकी हो या करने वाली हो।

·        भारतीय नागरिकों के अवयस्क बच्चें।

·        राष्ट्रमण्डल देशों के ऐसे नागरिक, जो भारत में रहते हो या भारत सरकार की नौकरी करते हो।

4. देशीकरण से- कोई विदेशी, जो वयस्क है और 10 वर्ष से भारत में निवास कर रहा हो। भारत सरकार से देशीकरण के प्रमाण पत्र प्राप्त कर भरत का नागरिक बन सकता है।

5. भूमि अर्जन द्वारा- यदि भारत सरकार द्वारा किसी नये भू-भाग को अर्जित कर भारत में इसका विलय किया जाता है अर्थात यदि कोई अन्य राज्य क्षेत्र भारत का भू-भाग बन जाता है, तो भारत सरकार यह विनिर्दिष्ट करेगी की उस राज्य क्षेत्र के व्यक्ति भारत के नागरिक होंगे।

बुधवार, 11 नवंबर 2020

Preamble

 

     उद्देशिका या प्रस्तावना (PREAMBLE)

श्री सुब्बाराव के शब्दों में- उद्देशिका किसी एक्ट के मुख्य आदर्शों एवं आकांक्षाओं का उल्लेख करती है।

सुप्रीम कोर्ट के शब्दों में- सुप्रीम कोर्ट के अनुसार उद्देशिका संविधान निर्माताओं के विचारों को जानने की कुंजी है।

बेरुबारी मामले में(1960)-  बेरुबारी के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि उद्देशिका संविधान का अंग नही है।

केशनवानन्द भारती बनाम केरलराज्य (1973)- केशवानन्द भारती के मामले में उच्चतम न्यायालय ने बेरुबारी को दिये निर्णय को उलटते हुए, यह निर्धारित किया की उद्देशिका संविधान का एक अंग(भाग) है।

 

1. संविधान के अधिकार का स्त्रोत- हम भारत के लोग ........इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते है। अर्थात ये शब्द लोगों के सर्वोच्च प्रभुता की घोषणा करते है और इस बात की ओर संकेत करते है, कि संविधान का आधार उन लोगों का प्राधिकार है।

2. भारत की प्रकृति- यह घोषणा करती है, कि भारत एक सम्प्रभु, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य व्यवस्था वाला देश है।

3. संविधान का उद्देश्य- न्याय, स्वतन्त्रता, समता एवं बन्धुत्व।

4. संविधान लागू होने की तिथि- 26 नवम्बर 1949, मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत 2006 विक्रमी।

5. संविधान का स्त्रोत- भारत के लोग ही संविधान के स्त्रोत है।

6. प्रस्तावना के मुख्य शब्द- प्रस्तावना में कुछ मुख्य शब्दों का उल्लेख है, जो निम्नलिखित है-

·        प्रभुतासम्पन्न (Sovereignty)- इस शब्द का आशय है, कि भारत आन्तरिक व बाह्य दृष्टि से किसी भी विदेशी सत्ता के अधीन नही है अर्थात इसके ऊपर और कोई शक्ति नही है।

·        लोकतान्त्रिक (Democratic)-लोकतान्त्रिक सरकार जनता के लिए तथा जनता के द्वारा स्थापित सरकार है। इसमें जनता द्वारा निर्वाचत प्रतिनिधि देश का शासन चलाते है।

·        पंथ निरपेक्ष (Secular)- यह शब्द 42वे संविधान संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा गया है। पंथ निरपेक्ष की धारणा संविधान में प्रयुक्त विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता कि पदावली में पहले से अन्तर नही थी। पंथ निरपेक्ष राज्य का तात्पर्य ऐसे राज्य से है, जो किसी विशेष धर्म को राजधर्म के रुप में मान्यता प्रदान नही करता है, वरन् सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करता है, तथा उन्हें समान संरक्षण प्रदान करता है।

·        समाजवाद (Socialism)- यह शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के तहत् जोड़ा गया। उद्देशिका में प्रयुक्त आर्थिक न्याय पदावली में समाजवाद की अवधारणा अन्तर्निहीत है। इसकी कोई निश्चित परिभाषा देना कठिन है। भारतीय समाजवाद लोकतान्त्रिक समाजवाद है, न कि साम्यवादी समाजवाद जिसे राज्यश्रित समाजवाद भी कहा जाता है। जिसमें उत्पादन और वितरण के सभी साधनों का राष्ट्रीयकरण और निरीह सम्पत्ति या साधनों का उन्मूलन शामिल है। लोकतान्त्रिक समाजवाद मिश्रित अर्थव्यवस्था में आस्था रखता है, जहाँ सार्वजनिक और निजी क्षेत्र साथ-साथ रहते है। अतएव भारत का संविधान प्राइवेट सम्पत्ति का उन्मूलन नही करता, किन्तु उस पर कुछ निर्बन्धन लगाता है, जिससे उसका उपयोग राष्ट्रीय हित में किया जा सके।

·        अखण्डता (Integrity)- ये शब्द भी 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया है। इस शब्द का समावेश पृथकतावादी प्रवृत्तियों को रोकने के लिए किया गया है।

·        गणतन्त्र (Republican)- इस शब्द से स्पष्ट है, कि भारत में वंशानुगत राजा की परम्परा का अंत हो गया है अर्थात भारत का राज्यध्यक्ष जनता का अप्रत्यक्ष चुना हुआ प्रतिनिधि होता है।

·        संविधान का उद्देश्य (Purpose of Constitution)- संविधान का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को निम्न अधिकार दिलाना है। न्याय(सामाजिक, राजानीतिक और आर्थिक), स्वतन्त्रता, विचार, मत, विश्वास, उपासना।

·        समता (Equality)- व्यक्ति की गरिमा और राज्य की स्वतन्त्रता।

7. उद्देशिका में संविधान (Constitution of Preamble)- केशवानन्द भारतीय बनाम केरल राज्य (1973) के मामले में सरकार की ओर से तन्त्र दिया कि उद्देशिका भी संविधान का एक भाग है, इसलिए अनुच्छेद-368 के तहत् इसमें संशोधन किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से यह निर्धारित किया कि, उद्देशिका संविधान का भाग है, अतः यह संशोधनीय है, किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उद्देशिका के उस भाग को संशोधित नही किया जा सकता है, जो आधारभूत ढ़ाँचे से सम्बन्धित हो।

8. प्रस्तावना में संशोधन की सम्भावना (Possibility of amendment in the preamble )- क्या प्रस्तावना में संविधान के अनुच्छेद-368 के तहत् संशोधन किया जा सकता है। यह प्रश्न पहली बार ऐतिहासिक केस केशवानन्द भारती(1973) के मामले में उठा। यह विचार सामने आया कि इसमें संशोधन नही किया जा सकता, क्योंकि यह संविधान का भाग नही है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि अनुच्छेद-368 के जरिए संविधान के मूल तत्व व मूल विशेषताओं, जो कि प्रस्तावना में उल्लिखित है, को ध्वस्त करने वाला संशोधन नही किया जा सकता है।

9.  उद्देशिका का महत्व (Importance of Preamble)-

·        सुभाष कश्यप- “संविधान शरीर है, तो प्रस्तावना उसकी आत्मा, प्रस्तावना आधारशिला है, तो संविधान उस पर खड़ी अट्टालिका।“

·        कृष्णा स्वामी अय्यर- “संविधान की उद्देशिका हमारी दीर्घकालिक सपनों का विचार है।“

·        के.एम. मुंशी- “हमारी सम्प्रभु लोकतान्त्रिक गणराज्य का भविष्यफल है।“

·        अर्नेस्ट बेकर- “उद्देशिका संविधान की कुंजी है।“ इन्होंने अपनी पुस्तक “Principle of Social and political theory” के प्रारम्भ में उल्लेख किया है।

·        पालकी वाला- “उद्देशिका संविधान का परिचय पत्र है।“

10. परिसंघ कल्प- संघ की सरकार, की शक्ति पर इतना बल दिया गया है, कि उससे उन सिद्धान्तों पर प्रभाव पड़ता है। जो सामान्तया परिसंघ के आधार समझे जाते है। इसके कारण एक विदेशी आलोचक प्रो. वेयर ने कहा है, कि-  भारत का संविधान एक ऐसी शासन प्रणाली की व्यवस्था करता है, जो कि परिसंघकल्प है। वह ऐकिक राज्य जिसमें कुछ अनुसंघीय परिसंघीय लक्षण है, यह अनुसंघीय ऐकिक लक्षण परिसंघीय राज्य नही है।

‘भारत का संविधान न तो शुद्ध रुप से परिसंघीय है और न तो शुद्ध रुप से ऐकिक, यह दोनों का समायोजन है। यह एक नये प्रकार का संघ या सम्मिलित राज्य है। इसमें यह सिद्धान्त अन्तर्विष्ट है, कि परिसंघ होते हुए भी राष्ट्रीय हित सर्वोच्च होना चाहिए।‘

11. संविधान के विशिष्ट लक्षण- संविधान के इतने विशान होने के अनेक निम्नलिखित कारण है।

·        विभिन्न संविधानों के संचित अनुभवों का समावेश।

·        विस्तृत प्रशासनिक उपबन्ध भी शामिल किये गये है- भारतीय संविधान के रचयिता शासन के मूल सिद्धान्तों को अधिनियमित करने से ही सन्तुष्ट नही हुए, उन्होंने प्रशासनिक बातों के ब्योरे का उपबन्ध करने के लिए भारत शासन अधिनियम 1935 को अंशतः अपना लिया।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर के शब्दों में- “प्रशासन के रुप में परिवर्तन किये बिना संविधान का दुरुपयोग करना बिल्कुल सम्भव है।“

·        इकाईयों का संविधान भी सम्मिलित है- भारत में संविधान के संघ और इकाई दोनों के संविधान सम्मिलित है। परिसंघ की इकाईयों का ऐतिहासिक उद्भव और राजनीतिक विकास अलग-थलग था,इसलिए विभिन्न वर्ग की इकाई के लिए विभिन्न उपबन्ध बनाये गये।

·        परिसंघीय संबन्धों पर विस्तार से विचार- इकाईयों से सम्बन्धित उपबंध तो विस्तार से बनाये ही गये है, साथ ही परिसंघ और इकाईयों के बीच और इकाईयों में परस्पर सम्बन्ध के उपबन्ध भी विस्तार से बनाये गये है। ये सम्बन्ध विधायी या प्रशासनिक दोनों ही है।

·        प्रवर्तनीय और अप्रवर्तनीय दोनों प्रकार के अधिकार सम्मिलित किये गये हो- अमेरीकी संविधान के संशोधनों के नमूने पर एक अधिकार विलेख है, जिसमें व्यक्ति को न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय मूल अधिकार प्राप्त है, इसके अतिरिक्त नीति निदेशक तत्वों को समाविष्ट करने वाला एक भाग भी है, जो व्यक्ति को न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय अधिकार प्रदान नही करता, किन्तु उन्हें देश के शासन में मूलभूत समझा जाता है।

·        लचीला अधिक कठोर कम- भारतीय संविधान का एक विशेष लक्षण यह भी है, कि वह लिखित परिसंघ संविधान को लचिलापन प्रदान करता है। संविधान के गिने-चुने उपबन्धों के संशोधन के लिए ही राज्य विधानमण्डलों से अनुसमर्थन की अपेक्षा है और तब भी आधे विधानमण्डलों का समर्थन ही पर्याप्त है, शेष संविधान का संशोधन संघी की संसद के विशेष बहुमत से किया जा सकता है अर्थात प्रत्येक सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत से और यह बहुमत सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत भी होना चाहिए। संसद को संविधान के बहुमत से उपबन्धों में साधारण बहुमत से परिवर्तन या उपान्तर करने की शक्ति दी गई है। साधारण विधेयक के लिए भी इतनी ही अपेक्षा होती है। लचीलेपन का उदाहरण संविधान में संसद को विधान बनाकर संविधान की अनुपूर्ति करने के लिए दी गई शक्तियाँ।